भाग – 62 हर टुकड़ा मेरे दिल का देता है दुहाई

सच्चा प्रेम जन्म जन्मांतर का होता है। हिंदी सिनेमा में प्रेम के शाश्वत होने की बुनियाद पर अनेक कहानियां गढ़ी जा चुकी हैं। पुनर्जन्म या अतृप्त आत्मा पर सैकड़ों गीत चित्रित किये गये हैं। इनमें से कईं गाने श्रोताओं के दिल में उतरकर मशहूर हुए। इसे चाहे अंधविश्वास कहें या वैज्ञानिक तौर पर झुठला दें पर रहस्य और रोमांच का यह विषय हिंदी फ़िल्मकारों को बहुत रास आया। और दर्शकों ने भी ऐसे चित्रपटों (महल, मधुमति,नीलकमल,मेहबूबा,कर्ज़ आदि) तथा उनके गीतों को खूब पसंद किया।
इस बार गीत गाथा में बातें एक ऐसे गीत की जो हमें किसी दूसरे लोक में ले जाता है। इसमें एक प्रेमिका की भटकती अतृप्त आत्मा का रुदन है। अपने प्रेमी को प्यार का वादा याद दिलाने की दुहाई है। एक विरहिणी का मर्मांतक रुदन है। यह दर्दभरा नग़्मा है – हर टुकड़ा मेरे दिल का देता है दुहाई,दिल टूट गया आपको आवाज़ न आई (यह रात फिर न आयेगी/आशा भोसले/ओ.पी.नैयर/अज़ीज़ कश्मीरी)।
यह रात फिर न आयेगी (1966) श्रीकृष्ण फ़िल्म्स के बैनर तले प्रदर्शित हुई थी। इसके निर्देशक ब्रिज सदानाह थे। पटकथा वेद राही और ब्रिज कत्याल और संवाद रमेश पंत के थे। सहायक संगीतकार थे जी. एस. कोहली और सेबस्टीन। श्रवणीय गीत संगीत के उपरांत भी रंगीन फ़िल्मों के दौर में आये इस श्वेत श्याम चित्रपट को दर्शकों का अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिला। इस चित्रपट की केंद्रीय भूमिका के साथ शर्मिला टैगोर ने पूरा न्याय किया है।
इस फ़िल्म में शायर अज़ीज़ कश्मीरी ने दो और गीत लिखे थे मोहब्बत चीज़ है क्या (आशा) और हुज़ूरेवाला जो हो इजाज़त (आशा और मीनू पुरुषोत्तम)। चार गीतों के गीतकार थे एस. एच.बिहारी – आपसे मैंने मेरी जान तथा फिर मिलोगे कभी (रफ़ी और आशा),मेरा प्यार वो है के (महेंद्र कपूर), मैं शायद तुम्हारे लिए अजनबी हूं एवं यही वो जगह है (दोनों आशा)।
हिंदी सिने जगत में अज़ीज़ कश्मीरी एक ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने गीत, पटकथा और संवाद लेखन के साथ साथ पत्रकारिता भी की। चालीस के दशक में उन्हें पहली बार फ़िल्म हिम्मत में गीत लिखने का मौका मिला। यह गीत था – इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा (शमशाद बेगम/पं.गोविंदराम) जिससे प्रेरित होकर पाकीज़ा के गीत की रचना की गई। इस हुनरमंद शायर ने पं. अमरनाथ, हुस्नलाल भगतराम, बुलो सी.रानी,श्यामसुंदर,विनोद,हंसराज बहल,शार्दुल क्वात्रा और लच्छीराम जैसे संगीतकारों के लिए गीत लिखे। लारीलप्पा लारीलप्पा लई रख दा (एक थी लड़की) उनका प्रसिद्ध गीत है। पचास के दशक के बाद इन संगीतकारों का युग समाप्त हो जाने पर अज़ीज़ कश्मीरी भी गुमनामी के अंधेरे में खो गये।
किस्सा उस वक्त का है जब ये रात फिर न आयेगी के कुछ गीत लिखे जा चुके थे। ओ.पी. नैयर के रिहर्सल कक्ष के बाहर अज़ीज़ कश्मीरी कईं दिनों से चक्कर काट रहे थे। पर चपरासी उन्हें भीतर जाने ही नहीं दे रहा था। एक दिन अज़ीज़ कश्मीरी ने कक्ष के बाहर निकलते ही ओ.पी.नैयर को अपना परिचय दिया। ओ.पी.नैयर ने इस बुज़ुर्ग शायर को बुलाकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। दरअसल उनके द्वारा पंजाबी फ़िल्म दूला भट्टी में लिखे गीत ओ.पी. नैयर किशोरावस्था में कोरस में गा चुके थे। बातचीत में खुलासा हुआ कि अज़ीज़ कश्मीरी के पास कईं दिनों से कोई काम नहीं है और उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। एक गाने के बमुश्किल तीन सौ रुपये मिलते हैं। यह सुनते ही ओ.पी.नैयर ने अज़ीज़ कश्मीरी से न सिर्फ़ तीन गाने लिखवाए बल्कि मेहनताना भी प्रति गीत एक हज़ार रुपये दिया। बाद में इस जोड़ी ने कुछ और फ़िल्मों में भी बेजोड़ तराने दिये।
इस फ़िल्म के संगीत सृजन के समय ओ.पी.नैयर अवकाश मनाने मसूरी की यात्रा पर थे। गीतकार एस.एच.बिहारी भी उनके साथ थे। दोनों फ़नकार एक गाने के प्रसंग के बारे में चर्चारत थे कि एक जगह वादी के रमणीय दृश्य से प्रेरित एस.एच. बिहारी ने गीत रचा- यही वो जगह है,यही वो फिज़ाएं,यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे। और ओ.पी. नैयर ने तुरंत उसकी धुन बना ली। ऐसे कमाल के थे उस दौर के फ़नकार।
आशा भोसले-ओ.पी.नैयर की जोड़ी ने 300+ गीतों का सृजन किया है। इनमें से आधे एकल गीत हैं। गायिका प्रधान संगीतकार ओ.पी.नैयर पर यह आरोप हमेशा लगता रहा है कि उन्होंने 1960 के बाद गीता दत्त और शमशाद‌ को दरकिनार करते हुए आशा को तरजीह दी। और इसपर इस रिदम के बादशाह का बड़ा ही स्पष्ट तर्क है। वे फर्माते हैं कि आशा का गाया ऐसा एक भी ऐसा ‌गीत नहीं है,जो किसी अन्य गायिका के गाने पर बेहतर हो सकता था। चर्चारत गीत में आशा ने अपनी खनकदार आवाज़ से दिल टूटने का जो अनोखा प्रभाव उत्पन्न किया है वह ओ. पी.नैयर के कथन की पुष्टि करता है। आशा ने दो लब्जों टूट और आवाज़ की अदायगी एक खास अंदाज़ में की है। अंतरे में उनके उच्च स्वरमान और ओ.पी.नैयर द्वारा रची गई धुन से नायिका के पारलौकिक होने का आभास होता है। आशा – नैयर जोड़ी के कईं गमज़दा नग़्मे हैं मसलन – बेकसी हद से जब गुज़र जाये,मुझे प्यार में तुम न इल्ज़ाम देते,फिर ठेस लगी दिल को, पूछो न हमें हम उनके लिए,वो हॅंस के मिले हमसे और चंदनगंधित रचना चैन से हमको कभी। चर्चारत गीत की इस फेहरिस्त में खास जगह है।
फ़िल्म ये रात फिर न आयेगी के कथानक के आरंभ में नायिका को आत्मा के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो उसके प्रेमी से मिलने के लिए भटक रही है। नायिका पर चित्रित दो अन्य गीत भी हॉन्टिंग मेलडी की श्रेणी में आते हैं और आशा की सुर यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। ये हैं – यही वो जगह है और मैं शायद तुम्हारे लिए अजनबी हूं। किसी रहस्य चित्रपट में एक ही गायक कलाकार (आशा भोसले) द्वारा ट्रांस में ले जाते तीन गीत गाने का यह बिरला संयोग है। पर हर टुकड़ा मेरे दिल का में एक अलग टीस है,विरह का दर्द है। इसकी धुन,तबले की हल्की हल्की रिदम,गायिकी और बोल इसे बाकि दोनों गीतों की तुलना में अधिक श्रवणीय बनाते हैं।
रहस्य चित्रपट ये रात फिर न आयेगी की कहानी एक पुरातत्व स्थल से शुरू होती है। प्रोफेसर (पृथ्वीराज कपूर) के निर्देशन में इस संरक्षित स्थान की खुदाई के दौरान एक महलनुमा संरचना के अवशेष मिलते हैं। उसमें एक मानव कंकाल देखकर प्रोफेसर और उनका सहायक राकेश (शैलेश कुमार) हतप्रभ रह जाते हैं। कंकाल के हाथों में कंगन हैं जो महल के अवशेषों में एक मूर्ति के कंगनों से मेल खाते हैं। सूरज (बिस्वजीत) प्रोफेसर के मरहूम दोस्त का बेटा है। वह चित्रकार है और करोड़ों की संपत्ति का वारिस भी। रीटा
(मुमताज़) सूरज की मंगेतर है। एक दिन जंगल में सूरज की मुलाकात एक रहस्यमय युवती किरण (शर्मिला टैगोर) से होती है। किरण से सूरज की कईं बार मुलाक़ात होती है और हर बार किरण रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती है। सूरज किरण से प्रेम करने लगता है। यह बात रीटा को खलती है। वह किरण की हत्या करने की कोशिश करती है। राकेश प्रोफेसर को बताता है कि किरण दो हजार साल पहले की राजनर्तकी की रूह है जिसे एक मूर्तिकार से प्रेम करने के कारण मार दिया गया था। हालात कुछ ऐसे बनने लगते हैं कि किरण के हाथों सूरज की मौत हो जायेगी। सूरज से प्रेम का नाटक कर रही किरण उससे सचमुच प्यार करने लगती है। वह सूरज के प्राण बचाने का प्रयास करती है। तभी इस षडयंत्र का सूत्रधार राकेश पुलिस की गिरफ्त में आ जाता है जिसने रीटा के साथ मिलकर किरण को ब्लैकमेल कर सूरज का खून करने की साजिश रची थी। किरण की सच्चाई सामने आने पर सूरज उसे अपना लेता है।
आलोच्य गीत फ़िल्म में दो बार होता है। पहली बार उस समय जब सूरज की कार जंगल में खराब हो जाती है। वह पानी लेने जाता है और उसे एक मधुर स्वर सुनाई देता है। वह काफ़ी खोजबीन के बाद किरण तक पहुंचता है। इस प्रसंग में सिर्फ़ पहला अंतरा है। बाकी दो अंतरे तब होते हैं जब एक पार्टी के बाद सूरज किरण को झील में नाव पर सवार देखता है। दोनों ही बार सूरज किरण की ओर आकर्षित होता है पर किरण उसके लिए एक अबूझ पहेली बनकर पेश होती है।
सूरज और किरण का जन्म जन्मांतर का संबंध है। सूरज से किरण की उत्पत्ति है और किरण से ही सूरज का अस्तित्व। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पर यदि अपनी बिछड़ी हुई किरण को सूरज न पहचान सके तो किरण क्या करे? चर्चारत नग़्मे में किरण की यही फरियाद है। उसके दिल के हर कोने से सूरज के लिए पुकार उठ रही है। पर उसके टूटे हुए दिल की सदा सूरज के कानों तक नहीं पहुंची है।
जिस प्यार को तलाशते हुए किरण की आत्मा भटक रही थी वह सूरज के रूप में उसके सामने है। किंतु सूरज के स्मृतिपटल से किरण का नाम मिट गया है। यह नियति का कैसा क्रूर खेल है। सारी कायनात किरण की इस दशा पर उदास है।
सूरज से विरह में किरण का क्या दोष था? इससे तो अच्छा था कि यह मिलन ही न होता। अब कितने जन्मों तक यह जुदाई सहना पड़ेगी?
इस निष्ठुर समाज ने हर बार इस मिलन को रोका है। किरण की सूरज से इल्तज़ा है -अब तो इस निद्रा से जागो। इस सपने के भ्रम से बाहर निकलो। अब भी मुझे नहीं पहचाना तो मैं तबाह हो जाऊंगी और दो बिछड़े हुए दिल कभी एक नहीं हो पायेंगे।
हर टुकड़ा मेरे दिल का
देता है दुहाई
दिल टूट गया आपको
आवाज़ न आई
आवाज़ न आई
हर टुकड़ा मेरे…
मंज़िल को तरसते हैं
और सामने मंज़िल है II1II
कहना ही पड़ा हमको
क़िस्मत बड़ी क़ातिल है
छुप छुप के मेरे हाल पे
रोती है खुदाई
दिल टूट गया…
क्या दोष हमारा था
हम ये न समझ पाये II2II
दुनिया तेरी महफ़िल में
हम आये तो क्यों आये
अब कितने जनम और
जलायेगी जुदाई
दिल टूट गया…
रोका है ज़माने ने
हर बार मिलन अपना II3II
कब नींद से जागोगे
कब टूटेगा ये सपना
जागे न अगर आप तो
जागेगी तबाही
दिल टूट गया…
किसी भी संगीतकार की किसी गायक कलाकार विशेष पर निर्भरता कभी तो दुग्धशर्करा योग होती है पर कभी कभी ज़्यादा मीठा घातक भी साबित होता है। हिंदी सिने संगीत की ऐसी ही कुछ वैभवशाली जोड़ियों का इतिहास रचने के बाद बड़ा ही बेसुरा हश्र हुआ। लता से अनबन के पश्चात सी. रामचंद्र का संगीत सूना हो गया। और आशा से अलगाव होने पर ओ.पी.नैयर की धुनों की खनक फीकी पड़ गई। ओ. पी.नैयर और आशा के बीच अहम का टकराव संगीत के लिए सबसे दुःखद सिद्ध हुआ। रसिक उस फड़कते संगीत से मढ़े मदमाते स्वर को तरसते रह गये। वे अरज करते रहे कि फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो। उनका दिल टूट गया पर किसी को आवाज़ न आई।

श्रीधर कामत सुनील वराडपांडे

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भाग – 61 जब भी ये दिल उदास होता है

यादें मनुष्य के जीवन का सहारा हैं। यादों के बिना वह अस्तित्वहीन है। उसके अवचेतन मन में यादों का चलचित्र अनवरत चलता रहता है। वह प्रसन्नता के क्षणों में यादों का उत्सव मनाता है और दुःखों के पलों में यादें उसके ज़ख्मों पर मरहम लगाती हैं। जब वह अकेलेपन में उदासी की चादर ओढ़ लेता है,किसी प्रियजन की याद और उसके सान्निध्य का आभास उसे उस तन्हाई के अंधेरे में रोशनी दिखाता है।
ऐसे ही उदास लम्हों में दिल को चैन देता एक रूहानी गीत इस बार की गीत गाथा में आपकी ख़िदमत में पेश है। यह गीत है – जब भी ये दिल उदास होता है,जाने कौन आसपास होता है (सीमा/मोहम्मद रफ़ी, शारदा/शंकर जयकिशन/गुलज़ार)। कभी एकाकीपन में यह गीत सुनाई दे तो सच में किसी आत्मीय जन के करीब होने का आभास होता है। यह गीत उन अमर तरानों में से है जो बकौल गुलज़ार कभी बूढ़े नहीं हुए। जिनकी त्वचा पर झुर्रियां नहीं पडीं। यह गीत सिर्फ़ सुनने या गुनगुनाने से ही उदासी दूर हो जाती है। इसका स्पंदन हृदय को सुकून पहुंचाता है।
इस विशेष गीत में दो सुखद संयोग बने। पहला गुलज़ार के मार्मिक शब्दों का मोहम्मद रफ़ी द्वारा स्वराभिषेक होना और दूसरा इस शब्द रचना का शंकर द्वारा सुरभित किया जाना। यह भी इत्तफाक़ है कि सीमा शीर्षक से 1955 में बनी फ़िल्म के संगीतकार भी शंकर जयकिशन ही थे। नूतन और बलराज साहनी अभिनित और अमिया चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित सीमा काफी लोकप्रिय हुई थी और उसके गीत भी उतने ही मशहूर हुए थे। पर नए कलाकारों को लेकर बनी इस फ़िल्म सीमा का बहुत बुरा हश्र हुआ। हालांकि चर्चारत गीत काफ़ी पसंद किया गया। इसका केनवास फ़िल्म की परिधि से अधिक व्यापक साबित हुआ।
1971 की फ़िल्म सीमा में तीन गाने वर्मा मलिक के थे – किसपे है तेरा दिल (रफ़ी, आशा),दिल मेरा खो गया (किशोर,आशा) और लड़की चली जब सड़कों पे (किशोर) एक गीत इंदीवर ने लिखा – वक्त थोड़ा सा अभी (किशोर,आशा)। चर्चारत गीत के अलावा एक लोरी गुलज़ार के हिस्से आई -एक थी निंदिया दो थे नैना (सुमन कल्याणपुर)।
सुरेंद्र मोहन की बतौर निर्देशक सीमा पहली फ़िल्म थी। इस चित्रपट का इसकी कहानी, पटकथा और संवाद गुलज़ार ने लिखे थे। इस फ़िल्म का छायांकन कुल्लू,हिमाचल प्रदेश में किया गया। इसमें वहां के लोकजीवन और सभ्यता की झांकी दर्शाई गई। सुरेंद्र मोहन ने निशान,हथकड़ी, हवालात,आपके दीवाने, हिरासत और धनवान जैसी फिल्में निर्देशित कीं। उन्हें राकेश रोशन से विशेष लगाव रहा।
यह शंकर जयकिशन की जयकिशन के निधन के बाद प्रदर्शित पहली फ़िल्म थी। सीमा के निर्माता ने इसे जयकिशन को समर्पित किया है। शंकर और जयकिशन के बीच काम के बंटवारे के साथ दोनों के गीतकार भी निश्चित थे। शंकर की शैलेंद्र से पटरी बैठती थी और जयकिशन के तार हसरत जयपुरी से जुड़ते थे। बहुत संभव है कि सीमा के संगीत में जयकिशन का योगदान ना रहा हो, क्योंकि गीतकार हसरत जयपुरी नदारद हैं। शैलेंद्र के असमय देहांत से शंकर को बड़ा आघात पहुंचा। उन्होंने राजेंद्र कृष्ण,इंदीवर,वर्मा मलिक और नीरज को आज़माकर देखा पर उन्हें किसी में भी शैलेंद्र का विकल्प नहीं मिला। शंकर ने हसरत से गिने चुने ही गीत लिखवाए।
इस फ़िल्म के नायक कबीर बेदी का किरदार भले ही छोटा हो,पर वे अपनी छाप छोड़ गये। अपने आकर्षक व्यक्तित्व और प्रभावशाली आवाज़ के
कारण कबीर बेदी हमेशा याद किये जाते हैं। इस चित्रपट के नायक की भूमिका में उन्होंने एक ऊर्जावान, ज़िंदादिल और हंसमुख प्रेमी की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया। कबीर बेदी की अभिनय यात्रा को देखते हुए लगता है कि इस अभिनेता की प्रतिभा का हिंदी सिनेमा में समुचित दोहन नहीं हुआ।
तारिका सिमी का रुपहले पर्दे पर लंबा कार्यकाल रहा है। कभी सहायक अभिनेत्री, कभी चरित्र भूमिका तो कभी खलनायिका के रूप में सिमी ने किरदार के साथ न्याय किया। सीमा की मुख्य भूमिका में सिमी ने एक ओर प्रेमिका का सौम्य किरदार निभाया तो मध्यांतर के बाद वे एक ममतामयी मां के रूप में नज़र आईं। दोनों ही रूपों में उनका अभिनय भावपूर्ण रहा।
एक संगीत कार्यक्रम में शारदा अयंगार की प्रस्तुति से प्रभावित राज कपूर ने उन्हें शंकर से मिलवाया। शारदा का स्वर उस दौर की सभी गायिकाओं से अलग था। शंकर को उनकी अनुनासिक आवाज़ बहुत पसंद आई और उन्होंने शारदा को फ़िल्म सूरज से पार्श्वगायन में पदार्पण का मौका दिया। उनका गाया गीत तितली उड़ी बहुत मशहूर हुआ और इस गाने ने इसी फ़िल्म के गीत बहारों फूल बरसाओ को कड़ी टक्कर दी। उस साल (1966) तक सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन के लिए एक ही फिल्मफेयर पुरस्कार मिलता था जो रफ़ी को मिला। पर फ़िल्मफेयर ने इसके बाद पार्श्वगायन के लिए गायक और गायिका की दो श्रेणियां बना दीं। इस तरह शारदा को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को दो भागों में बांटने का श्रेय मिला।
शारदा के अधिकांश गीत शंकर जयकिशन की जोड़ी के शंकर द्वारा स्वरबद्ध किए गये हैं। उन्होंने कुछ ही गीत चुनिंदा संगीतकारों के संगीत निर्देशन में भी गाये। शारदा को लेकर शंकर और जयकिशन में मतभेद रहे। हिंदी सिने संगीत की इस सबसे सफल जोड़ी की लता मंगेशकर के साथ अनबन के बाद जयकिशन सुमन कल्याणपुर को अवसर देने के पक्षधर थे जबकि शंकर शारदा को लेकर आग्रही रहे। संगीतकारों की प्रसिद्ध जोड़ियों में शंकर ही ऐसे फ़नकार थे जिन्होंने अपने साथी जयकिशन के निधन के बाद भी फ़िल्मों में संगीत देना जारी रखा।
गीतकार और शायर गुलज़ार एक प्रयोगवादी रचनाकार रहे हैं। कभी वे शैलेंद्र के अनुयायी लगते हैं तो कभी साहिर के शिष्य। गुलज़ार की रचनाओं में प्रकृति का भरपूर समावेश रहा है जैसे – बारिश,बूंदें,हवा,शाम,भोर,चांद,चांदनी, धूप, छांव। विस्मित करते रूपक और ध्वनि के प्रयोग उनके गीतों का सिंगार करते हैं। देश की संस्कृति और मिट्टी से जुड़े गुलज़ार भाषाई व्याकरण के बंधन से मुक्त होकर शब्दों की नई व्याख्या करते हैं। सत्तर के दशक से पहले गुलज़ार की गीतकार के रूप में प्रतिभा का समुचित उपयोग नहीं हुआ था। कुछ ही संगीतकारों जैसे सलिल चौधरी, हेमंत कुमार और वसंत देसाई आदि ने उनसे गीत लिखवाये।
इस चित्रपट की केंद्रबिंदू इसकी नायिका सीमा (सिमी) एक रईस खानदान की इकलौती वारिस है। बचपन में ही उसके माता पिता का देहांत हो जाने से सीमा खुद को मनहूस समझती है। उसका वहम है कि जो उससे प्यार करेगा उसकी मौत हो जायेगी। सीमा छुट्टियां मनाने कुल्लू आती है जहां उसकी मुलाकात सुनील (कबीर बेदी) से होती है। सुनील पहली नज़र में सीमा को दिल दे बैठता है। सीमा शुरू में तो प्रेम करने से डरती है पर बाद में मान जाती है। दोनों मंदिर में शादी कर लेते हैं। सुनील की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है। सीमा का अंधविश्वास और गहरा जाता है कि वह अपशकुनी है। वह सुनील के बेटे को जन्म देती है। उसे कहा जाता है कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। यह बच्चा नौकरानी के घर पलता है। बच्चा बांके बड़ा होकर (राकेश रोशन) ड्राईवर बनता है। सीमा को पता चल जाता है कि बांके ही उसका अभागा बेटा है। सीमा उसे जीवन की सारी खुशियां देना चाहती है पर अपना अशुभ साया उसपर पड़ने नहीं देना चाहती। इसी पसोपेश में एक दिन वह पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए आत्महत्या करने का निर्णय लेती है। तभी बांके उसे बचा लेता है और फ़िल्म का सुखांत होता है।
आलोच्य गीत सिनेमा के पर्दे पर उस समय आता है जब सुनील और सीमा एक दूजे से दूर यादों में खोये हुए हैं। उनका प्रेम अपरिभाषित है क्योंकि सीमा ने सुनील की प्रेम पाती पर कोई निर्णय नहीं लिया है। वह अपने वहम के कारण डर भी रही है और उसके मन में सुनील के प्रति प्रेम का अंकुर भी फूट रहा है। गाना पार्श्व में है पर रफ़ी के स्वर में सुनील की सीमा के प्रति भावनाएं व्यक्त हो रही हैं। रफ़ी ने मुखडा सौम्य स्वर में गाया है परंतु अंतरे में उनका स्वरमान बहुत ऊंचा है। हल्का सा ईको गाने को और मधुरता प्रदान करता है। शारदा ने गुनगुनाकर सीमा के असमंजस के बीच प्रेम भाव को मुखर किया है।
यह गीत गुलज़ार की इसी शीर्षक की ग़ज़ल की कोख से जन्मा है। दरअसल गुलज़ार ने इसे फ़िल्म के प्रसंग के अनुसार ढाल दिया है। यह गीत गुलज़ार के अन्य गीतों की तरह पहेलीनुमा है और शब्दों के भावार्थ खोजने पर विवश करता है। प्रेम एक ऐसा रसायन है जिसकी शब्दों में व्याख्या करना जटिल कार्य है। नायक ने नायिका को प्रेम प्रस्ताव दे दिया है। दोनों अलग अलग जगहों पर हैं। नायक को नायिका के उत्तर की प्रतीक्षा है। नायक के मन की चलबिचल इस गाने के ज़रिए व्यक्त हो रही है जो टेप रिकॉर्डर पर बज रहा है। उधर नायिका भी यही गीत रेडियो पर सुन रही है। वह अपशकुन के वहम के चलते प्यार को कबूल नहीं कर पा रही पर इस मीठी चुभन की सिहरन में खोई हुई है। वह गीत के बीच बीच में गुनगुना कर इश्क की सीढ़ी चढ़ने की कोशिश कर रही है।
जब भी ये दिल उदास होता है के माध्यम से गुलज़ार ने सुनील के प्रेम प्रस्ताव की व्यथा व्यक्त की है। सीमा के मन का भय उसे पता है। सुनील प्रेम की नदी में बहना चाहता है पर उसे आशंका है कि सीमा उसे स्वीकार करेगी या नहीं। उधर सीमा पर भी सुनील की यादों के बादल डेरा डाले हुए हैं। वह पसोपेश में है।
कभी कभी दिल एकाकी हो जाता है। वह खालीपन,वह तन्हाई किसी भी तरह दूर नहीं होती। जीवन उत्साहहीन होकर व्यर्थ लगने लगता है। मन को रिझाने के सभी प्रयास असफल हो जाते हैं।
ऐसे बोझिल क्षणों में अंजाने ही एक चेहरा मन में डेरा डाल देता है। और फिर उस प्रिय व्यक्ति के करीब होने का आभास होता है। लगता है कि यह अकेलापन, यह बेखुदी और यह विरह उसके करीब होने के खयाल से खत्म हो जाएगी।
भले ही गुलज़ार ने “जाने कौन” के माध्यम से अनिश्चितता व्यक्त की है पर प्रेमी उस चेहरे को पहचानता है। वह जाना पहचाना और आत्मीय चेहरा है। पर अभी कितनी दूर है। कहीं उसका विरह तो इस दिल को उदासी का कारण नहीं। गुलज़ार का अंदाज़ ही कुछ अलग है। जो सबके सामने है उसे वे धीरे से छुपा लेते हैं। और जो गूढ़ है उसे सामने कर देते हैं।
यह गुलज़ार की कलम का ही जादू है कि बंद होंठ भी मुखर हो उठते हैं। ठंडी आंहों में सांस की तपन जैसा कॉन्ट्रास्ट गुलज़ार की कविता में ही मिल सकता है। ये शब्द मन को भेद जाते हैं। एक गुम हो चुके प्यार के उदास खालीपन का अनुभव दे जाती हैं ये पंक्तियां।
आश्चर्य की बात तो यह है कि ये उदासी भी प्रिय और सुखद लगने लगती है। गुलज़ार की लेखनी की विशेषता है कि वह अकेलेपन को,विरह को
उत्सव में परिवर्तित कर देती है। महज यादों का कितना सजीव और तरल वर्णन है।
एक ओर मस्तिष्क पटल पर प्रेमिका का आभास, उसके चित्र और उसके विचार तैर रहे हैं और पार्श्व में उसका चेहरा दिखाई दे रहा है। प्रेमी दर्पण में अपनी छबि नहीं देख रहा। आईना एक मासूम प्रश्न लेकर उसे एकटक निहार रहा है। यूं तो यह विचित्र कल्पना लगती है। पर कईं बार हम दर्पण के सामने बेखुदी में, अपने ही विचारों में मग्न खड़े रहते हैं। इसी अनुभव को गुलज़ार ने कलमबद्ध किया है।
जब प्रेम का श्रीगणेश ही नहीं हुआ हो,फिर मन क्यों मिलन के लिए उत्सुक है? कोई वादा ही नहीं किया तो फिर ये प्रतीक्षा कैसी? जब बिना कारण मन को दिलासा मिल जाए तो दिल पर आशंका के बादल मंडराने लगते हैं।
जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस पास होता है
जब भी ये दिल उदास होता है
होंठ चुपचाप बोलते हों जब II1II
सांस कुछ तेज़ तेज़ चलती हों
आंखें जब दे रही हो आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो -2
जब भी ये दिल…
आंखों में तैरती हैं तस्वीरें
तेरा चेहरा तेरा खयाल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए -2
जब भी ये दिल…
कोई वादा नहीं किया लेकिन -II3II
क्यूं तेरा इंतज़ार रहता है
बेवजह जब करार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है -2
जब भी ये दिल…
ज़िंदगी के सफ़र में बिछड़े हुए प्रियजन हमारी स्मृति का अभिन्न अंग होते हैं। उनका स्मरण हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। वे अप्रत्यक्ष रूप से हमारे इर्द गिर्द ही होते हैं। एक उदास दिल किसी अपने की सोहबत की उम्मीद करता है। इस यादगार नग़्मे की नक्काशीदार धुन बनाते समय शंकर को भी जयकिशन और शैलेंद्र की याद आई होगी। आंखों में तस्वीरें तैरी होंगी। आईने ने मासूम सवाल पूछा होगा और फिर दिल बड़ा बेकरार हुआ होगा।

श्रीधर कामत * श्रीनिवास बेलसरे

9826824680 # 9969921283

भाग – 60 आज की काली घटा

भीषण गर्मी से त्रस्त प्यासी धरती को सावन की काली घटा की प्रतीक्षा रहती है। काली घटा प्रकृति को नीर वर्षा से आकंठ तृप्त कर देती है। वातावरण में सौंधी मिट्टी का इत्र घुल जाता है। वसुंधरा का हरितिमा से नवश्रृंगार होता है। ये काले घन जीवन में नई उमंग और उत्साह का संचार करते हैं और मौसम सुहाना हो जाता है। परंतु इन स्याह मेघों का चरित्र रहस्यमय है। कभी-कभी ये बादल बेवफाई कर जाते हैं। उमड़ घुमड़ कर तो आते हैं पर घनघोर अंधेरा कर बिना बरसे ही चले जाते हैं।
गीत गाथा के इस पर्व में हाज़िर है एक ऐसा ही इठलाता तराना जिसमें काली घटा का तो वर्णन किया गया है पर इसमें वर्षा का कोई ज़िक्र नहीं है। इस गीत में काले घन को लेकर असमंजस है कि यह किसे तरबतर करेगा और किसे तरसायेगा। यह अल्हड नग़्मा है – आज की काली घटा,मस्त मतवाली घटा (उसकी कहानी/गीता दत्त/कनू रॉय/कैफ़ी आज़मी)। उसकी कहानी (1966) बासु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार अंजू महेंद्रू,तरुण घोष और दीना पाठक थे। यह फ़िल्म बुरी तरह असफल रही़। इस चित्रपट में एक और गीत था – तेरा है जहां सारा,जिसे हेमंत कुमार ने स्वर दिया था जो लोकप्रिय नहीं हुआ पर काली घटा वाला यह गीत श्रोताओं के मन को सदा के लिए भिगो गया।
यूं तो निर्देशक के रूप में बासु भट्टाचार्य की पहली फ़िल्म तीसरी कसम थी। पर उसके निर्माण और वितरण में विलम्ब के कारण उनकी दूसरी फ़िल्म उसकी कहानी पहले प्रदर्शित हो गई। बासु भट्टाचार्य हिंदी चित्रपट जगत में समानांतर सिनेमा की नींव रखने वाले फ़िल्मकारों में शामिल हैं। इस अभिशप्त निर्देशक ने अपने ससुर बिमल रॉय की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की पर उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हुई।
अंजू महेंद्रू का फिल्मी जीवन भी संघर्षमय ही रहा। एक मॉडल के रूप में काम करते हुए कैफ़ी आज़मी के संपर्क में आईं जिन्होंने बासु भट्टाचार्य से उसकी कहानी की नायिका के लिए सिफारिश की। अंजू महेंद्रू का राजेश खन्ना से इश्क चर्चा में रहा। राजेश खन्ना तो शिखर पर पहुंच गए पर अंजू महेंद्रू इस एक फ़िल्म के बाद नायिका नहीं बन सकीं। उन्हें छोटी मोटी भूमिकाओं से काम चलाना पड़ा। राजेश खन्ना के शादी के प्रस्ताव को ठुकराना उनके जीवन की सबसे बड़ी गलती थी। अंजू महेंद्रू का इम्तियाज खान से भी प्रेम प्रसंग चला लेकिन यह रिश्ता भी टूट गया।
कनू रॉय सिने जगत के प्रतिभाशाली किंतु अति उपेक्षित संगीतकार रहे हैं। गायक बनने की तमन्ना लिए फिल्म जगत में आये कनू रॉय ने कुछ फ़िल्मों में अभिनय किया। अभाव के दिनों में उन्हें वेल्डिंग का काम भी करना पड़ा। उनका कोलकाता के हावड़ा ब्रिज की मरम्मत में भी योगदान रहा। स्थापित संगीतकारों के साथ बतौर वादक काम करते हुए वे सलिल चौधुरी के सहायक बने। उसी दौरान शैलेंद्र से जान पहचान हुई जिन्होंने बासु भट्टाचार्य को उसकी कहानी के संगीत के लिए कनू रॉय का नाम सुझाया। उन्होंने ज्यादातर बासु भट्टाचार्य की फ़िल्मों में ही संगीत दिया। बासु भट्टाचार्य बहुत मितव्ययी फ़िल्मकार थे। उनके कम बजट के कारण कनू रॉय ने सिर्फ़ पांच-छः साजिंदों को लेकर फ़िल्म का संगीत रचा। एक अतिरिक्त वायलिन वादक की मांग करने पर उन्हें ताना सुनना पडा था कि उसका पारिश्रमिक तुम्हें देना होगा।
गीतकार कैफ़ी आज़मी उन दिनों बहुत तंगी में चल रहे थे। उनके पास काम नहीं था। घर चलाना मुश्किल हो गया था। जब वे इस फ़िल्म के गीत लिखने की पेशकश लेकर बासु भट्टाचार्य से मिले तो उन्हें कहा गया कि गीत लिखने का अभी कोई पारिश्रमिक नहीं मिलेगा,फ़िल्म चली तो देखेंगे। कनू रॉय ने भी नाममात्र रकम लेकर संगीत दिया। और गीता दत्त ने तो मुफ़्त में ही गा दिया। ऐसे फक्कड़ थे उस दौर के महान फ़नकार।
यह गीत विशुद्ध रूप से गीता दत्त का है। इसपर उनके कंठ की बारीक कारीगरी की कुछ ऐसी मोहर उमटी है मानो इसे कोई अन्य गायिका इतने कोमल और मादक स्वर में गा ही नहीं सकती थी। गीत की धुन भी उतनी ही मखमली है। सीमित वाद्यों के बीच गीता दत्त के सर्दीले सुर कानों में शीतल बयार की तरह गुनगुनाते हैं। यह अप्रतिम काव्यशिल्प है। कैफ़ी आज़मी ने इसे गीत रचना के निर्धारित मापदंडों की चौखट उलांघकर बिना तुकबंदी के संवादात्मक शैली में लिखा है। काली घटा की तरह स्वच्छंद विचरण करता यह नग़्मा सुनकार को विस्मित कर देता है। गीत में नायिका खुद से ही सवाल कर रही है और जवाब के प्रति अंजान भी बन रही है। कैफ़ी आज़मी ऐसी जादूगरी हीर रांझा में भी कर चुके हैं। याद कीजिए गीत – मेरी दुनिया में तुम आये,जिसमें बीच बीच में संवाद भी हैं।
जब गीता दत्त बड़े ही अल्हड़पन से कहती हैं मुझे क्या मालूम,तब वे मजमा लूट ले जाती हैं। यह प्रश्नवाचक पंक्ति इस गीत की आत्मा है। गीता दत्त जो गुरु दत्त से अलगाव और फिर उनकी आत्महत्या के सदमे से उबर ही नहीं सकीं। गीता दत्त जो अपने सारे दुःख और एकाकी जीवन मदिरा के प्याले में घोलकर पी गईं। गीता दत्त जिनके उत्कर्ष के दिनों के संगीतकार बुरे वक्त में साथ छोड़ चुके थे। उन्हीं गीता दत्त को संगीतकार कनू रॉय ने उसकी कहानी से पुनर्स्थापित किया। और गीता दत्त ने अपनी उन्मुक्त गायन शैली से इस गीत को चिरयुवा बना दिया।
चित्रपट अनुभव के अविस्मरणीय गीत विशेषकर कोई चुपके से आके सुनकर लगता है कि यह आज की काली घटा का उत्तरार्ध गीत है। इस गीत के मुखड़े के अंत में गीता दत्त बड़े लाड से गाती हैं – मुझे क्या मालूम? कुछ ऐसा ही प्रश्न कोई चुपके से आके के मुखड़े की समाप्ति पर है -ये मैं कैसे जानूं? दोनों गीतों में एक से भाव हैं और एक जैसे प्रश्नों से नायिका का असमंजस अभिव्यक्त हुआ है।
फ़िल्म उसकी कहानी का केंद्रीय पात्र एक नेकदिल युवक राजू है जिसके सेवाभावी स्वभाव का लोग खूब फायदा उठाते हैं। राजू के पड़ोस में रेखा और उसका भाई प्रदीप रहने आते हैं। रेखा राजू में छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे हास्य कलाकार बनने के लिए प्रेरित करती है। राजू कॉलेज स्तर पर कॉमेडी कर प्रसिद्धि पा लेता है। वह मन ही मन रेखा से प्यार करता है पर अपने दिल की बात उसे बता नहीं पाता। राजू कुछ समय के लिए शहर से बाहर जाता है। इस दौरान रेखा की शादी तय हो जाती है। राजू को लौटते ही यह खबर सुनकर धक्का लगता है। वह लाईलाज बीमारी से घिर जाता है। रेखा के विवाह समारोह में हास्य कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए वह दम तोड देता है।
गायिका गीता दत्त ने यह गीत कोमलता और मादकता दोनों का मिश्रण कर गाया है। उनका विकल स्वर मन को सम्मोहित कर जाता है। ऑर्केस्ट्रा तो बहुत ही सीमित है। हर साज़ की खनक साफ़ सुनाई देती है। गीता दत्त की नशीली मीठी हमिंग से गाना आरंभ होता है। पियानो की तरंगें और बीच बीच में वायलिन के मोहक टुकड़े। यह गीत सिने संगीत के महासागर की तह में पड़ा मोती है।
गीता दत्त के स्वर में एक तरलता,गूढता और आत्ममग्नता है। मानो वे खुद से ही ऐसे सवाल पूछ रही हैं जिनका जवाब उन्हें भी नहीं पता। यह नग़्मा नायिका रेखा के दिल और मन के द्वंद को उजागर करता है जो राजू के प्रेम प्रस्ताव को लेकर दुविधा में है। रेखा उस काली घटा से हो रही अमृतवर्षा में भीगना तो चाहती है पर बरसती झड़ी की चुभन नहीं झेलना चाहती। उसके हृदय और मस्तिष्क में द्वंद छिड़ गया है।आकाश में घिर आये काले मेघ देखकर विकल मन के कैनवास पर कल्पना की कूची चलने लगती है। किंतु मन इन कल्पनाओं को स्वीकार करने की बजाय नकारता रहता है। कभी खुद की द्विधा मनःस्थिति के कारण तो कभी लोकलाज की वजह से। पर रेखा के मन का यह असमंजस वह काली घटा ताड़ लेती है।
उस मस्त मतवाली घटा को पता है कि किसी की उसके आगमन से भीगकर तृप्त होने की बजाय प्यास और भड़कने वाली है। पर उसे यह नहीं मालूम कि कभी कभी पूर्णत्व की तुलना में अतृप्तता की मिठास अधिक सुखद होती है। कईं बार इस तरह तड़पने,तरसने और प्यासे रह जाने में ज़्यादा समाधान मिलता है।
पहले अंतरे में रेखा के जीवन में राजू के आने का संकेत है। वह उसकी नज़रों में समा चुका है। उसके इस तरह आने से मन प्रसन्न भी है और विचलित भी। इस नए नवेले प्रेम का आकर्षण भी है और लोकलाज का भय भी। दिल इस काली घटा की बौछारों में भीगने को तरस रहा है पर मन इसकी गर्जना और बिजली गिरने के प्रति आशंकित है। “जी डरता है” में कैफ़ी आज़मी जिन भावनाओं को व्यक्त करना चाहते थे उन्हें गीता दत्त ने बखूबी अंजाम दिया है।
उसके अस्तित्व को मन द्वारा महसूस किया जाना काली घटा की जानकारी में है। फिर भी मन उद्विग्न होकर पूछता है – क्यों समाया है? मुझे क्या मालूम?
प्रेम के नवांकुर की काली घटा हमराज़ है यह जानकर मन उस प्रेम को नकारने के लिए छटपटाता है। प्रेमी दिल के द्वार तक आ पहुंचा है। उसकी नज़रों में वह चुम्बकीय आकर्षण,वह प्यास मन को पता है। उस निगाह में दिख रही आत्मीयता,समर्पण और निष्ठा मन पढ़ चुका है। फिर भी इस प्रेम प्रस्ताव से अंजान बनने का प्रयास किया जा रहा है। यहां गीता दत्त के स्वर का कम्पन की संभ्रमित स्थिति को उजागर करता है। अब यह दर्द, तडप और बेकरारी अनुरागी मन को अच्छी लगने लगी है। उसे समझ में आ रहा है कि वह किसी की यादों में खोया हुआ है। उसका एहसास एक साये की तरह उसके साथ रहने लगा है। पर मन अभी भी आशंकित है। या वैसा दिखावा कर रहा है। यह सब प्रेम बंधन में बंध कर भी उस पाश को नकारने का जतन है।
आज की काली घटा
मस्त मतवाली घटा -2
मुझसे कहती है कि
प्यासा है कोई
कौन प्यासा है?
मुझे क्या मालूम?
आज की काली घटा
प्यास के नाम से जी डरता है II1II
इस इल्ज़ाम से जी डरता है
शौक-ए-बदनाम से जी डरता है
मीठी नज़रों में समाया है कोई
क्यूं समाया है?
मुझे क्या मालूम?
आज की काली घटा…
प्यासी आंखों में मुहब्बत लेके II2II
लड़खड़ा जाने की दावत लेके
मुझसे बेवजह शिकायत लेके
दिल की दहलीज़ तक
आया है कोई
कौन आया है?
मुझे क्या मालूम?
आज की प्यासी घटा…
कुछ मज़ा आने लगा जीने में II3II
जाग उठा दर्द कोई सीने में
मेरे एहसास के आईने में
इक साया नज़र आता है कोई
किसका साया है?
मुझे क्या मालूम?
आज की काली घटा…
ज़िंदगी पहले ना थी इतनी हसीन II4II
और अगर थी तो मुझे याद नहीं
यही अफ़साना ना बन जाए कहीं
कुछ निगाहों से सुनाता है कोई
क्या सुनाता है?
मुझे क्या मालूम?
आज की काली घटा…
काली घटा कभी बरसती है और कभी तरसाकर चली जाती है। बदरिया का खुद पर कोई नियंत्रण नहीं है। वह तो हवाओं के भरोसे है। जिधर हवा उड़ा ले जाये,उधर चल देगी। जहां ठहर जाये वहां बरस जायेगी। कुछ ऐसा ही अंजू महेंद्रू के साथ हुआ। राजेश खन्ना के साथ सुखी जीवन बिताने का मौका था,पर असमंजस का शिकार हो जाने से उसकी कहानी अधूरी रह गई। काश,अंजू महेंद्रू ने काली घटा का रुख भांप लिया होता तो उन्हें भी समझ में आ जाता कि आखिर उनकी मीठी नज़रों में समाया है कौन। और फिर उन्हें यह न कहना पड़ता – मुझे क्या मालूम।

श्रीधर कामत नयना पिकळे

9826824680 9967053967

भाग – 59 जीवन की बगिया महकेगी

मातृत्व की कल्पना अपने आप में इतना अनूठा और वात्सल्य पूर्ण अनुभव है कि इसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। घर परिवार में एक नन्हे मेहमान के आगमन की सूचना से वातावरण ऊर्जावान हो जाता है। संतानसुख विधाता द्वारा हर प्राणी को प्रदत्त सर्वोच्च सुख है। अभिभावक उस आगंतुक शिशु की कल्पना करते हुए उसके भविष्य के ताने बाने बुनने लगते हैं। इस प्रसंग पर सिने गीतकारों ने बड़े ही नाज़ुक और हृदयस्पर्शी गीत रचे हैं। चंदा से होगा वो प्यारा या तेरे मेरे मिलन की ये रैना जैसे युगल गीतों में इसी निर्मल आनंद की अनुभूति है।
गीत गाथा की इस कड़ी में एक ऐसा ही प्यारा, राजदुलारा गीत प्रस्तुत है – जीवन की बगिया महकेगी (तेरे मेरे सपने/लता,किशोर/सचिनदेव बर्मन/नीरज)। इस गीत में एक दंपति अपने आंगन में खिलने वाले पुष्प की सुगंध में सराबोर हो उसके भविष्य की कल्पना कर रहे हैं। यह गीत अपने मर्मस्पर्शी बोलों,सुमधुर संगीत और नाज़ुक तरीन गायिकी के कारण श्रोताओं को अभिभूत कर जाता है।
नवकेतन फ़िल्म्स के बैनर तले प्रदर्शित फ़िल्म तेरे मेरे सपने (1971) विजय आनंद की संकल्पना थी। प्रेम पुजारी की सफलता के बाद देव आनंद छुट्टी मनाने अनुज विजय आनंद के साथ महाबलेश्वर के लिए रवाना हुए। दोनों भाई नवकेतन फ़िल्म्स की अगली सिनेकृति पर चर्चा करने लगे। पूरे रास्ते विजय आनंद ने अपने अग्रज को एक विदेशी उपन्यास की कहानी सुनाई और कुछ प्रसंग तथा दृश्य भी समझाये। गंतव्य पर पहुंचने के बाद विजय आनंद के मन में उथल पुथल मच रही थी। क्या पता,भाई को कहानी पसंद आयी या नहीं। देव आनंद कार में से उतरते ही होटल में गए। उन्होंने नवकेतन के कार्यालय में ट्रंक कॉल लगाकर प्रेस वार्ता में विजय आनंद के निर्देशन में अगली फ़िल्म की घोषणा करने के लिये निर्देश दिये। यही था भावनिक चित्रपट तेरे मेरे सपने।
इस फ़िल्म में एक और युगल गीत था – हे मैंने कसम ली(किशोर,लता)। दो मार्मिक एकल गीत लता ने गाये – जैसे राधा ने माला जपी श्याम की और मेरा अंतर एक मंदिर है तेरा। दो गानों को आशा भोसले ने स्वर दिया – ता थई तत थई आता थई थै तथ एवं फुर्र उड़ चला दिल मेरा। मन्ना डे और आशा का एक एक एकल गीत भी था जो लोगों की ज़ुबां पर नहीं चढ़ा। इस फ़िल्म में देव आनंद के लिए रफ़ी की आवाज़ का इस्तेमाल नहीं किया गया।
इस चित्रपट को नवकेतन की अन्य फ़िल्मों की तरह अपार सफलता नहीं मिली। शायद दर्शकों की बदलती पसंद को यह संवेदनशील विषय रास नहीं आया। इस फ़िल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई थी कि खल पात्र भले मनुष्य के भीतर ही छुपा होता है और समय आने पर बाहर आकर अपना रंग दिखाता है। इस प्रयोग को सिने प्रेमी जनता ने नकार दिया। उन दिनों मुंबई के दादर स्थित कोहिनूर सिनेमाघर में दादा कोंडके की फ़िल्म सोंगाड्या चल रही थी। मालिक ने ज़्यादा कमाई के लालच में उसे उतारकर तेरे मेरे सपने लगा दी। इसपर इतना हंगामा हुआ कि यह हिंदी बनाम मराठी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। आखिर राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण कोहिनूर में तेरे मेरे सपने को हटाकर सोंगाड्या को फिर से प्रदर्शित किया गया। इस चित्रपट में देव आनंद अपनी चिर परिचित छैलाबाबू शैली से हटकर नज़र आये। उनपर एक भी एकल रोमांटिक गाना नहीं फ़िल्माया गया। जब नायिका के साथ इश्क़ लड़ाना था तब वे सिद्धांतवादी डॉक्टर बन गरीब श्रमिकों का ईलाज करते दिखे। वैसे भी देव आनंद ने अधिकांश फ़िल्मों में कुंवारे प्रेमी की भूमिका निभाई है। इस फ़िल्म में वे न सिर्फ़ पति के परिपक्व किरदार में नज़र आये,बल्कि पिता भी बने। पर उनके चरित्र में विरोधभास दिखाई दिया। आरंभ में उनकी छबि एक सेवाभावी डॉक्टर की है पर मध्यांतर के बाद उनपर महत्वाकांक्षा हावी हो जाती है। मुमताज़ हिंदी सिनेमा की वह तारिका हैं जिन्होंने फर्श से अर्श तक की अभिनय यात्रा की। एक बाल कलाकार के रूप में पर्दे पर पदार्पण के बाद मुमताज़ स्टंट फ़िल्मों में दारासिंह की नायिका बनी। अपनी छोटी नाक की खामी के बावजूद मुमताज़ ने नृत्य कौशल और यादगार गीतों के दम पर छबि बनाई। अनेक फ़िल्मों में छोटी बड़ी भूमिकाएं निभाने के बाद एक दिन मुमताज़ की किस्मत तब चमकी जब उन्हें राम और श्याम में दिलीप कुमार की नायिका बनाकर पेश किया गया। दो रास्ते से उनकी राजेश खन्ना के साथ जोड़ी बनी जो काफ़ी लोकप्रिय हुई और उनकी गिनती अग्रणी नायिकाओं में होने लगी। तेरे मेरे सपने में मुमताज़ की प्रतिभा से प्रभावित होकर देव आनंद ने उन्हें अपनी अगली फ़िल्म हरे राम हरे कृष्ण में भी नायिका बनाया। खिलौना में जज़्बाती किरदार के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।

कवि और गीतकार नीरज का कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश रहा। उन्होंने कईं नौकरियां कीं पर अपने फक्कड़ स्वभाव के कारण वे कहीं टिक नहीं सके। कवि सम्मेलनों में शिरकत के दौरान चित्रपट नई उमर की नई फसल में गीत लिखने का मौका मिला। रोशन का संगीतबद्ध गीत कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे देशभर में गूंजा। गैंबलर, प्रेम पुजारी और शर्मीली में सचिनदेव बर्मन के स्वरबद्ध अर्थपूर्ण गीत अत्यंत लोकप्रिय हुए। कुछ समय के बाद नीरज का फ़िल्मों से मोहभंग हो गया और वे अलीगढ़ लौट गये।
सत्तर के दशक के आरंभ में रिकॉर्ड निर्माण कंपनी पॉलीडोर के आगमन से HMV के एकाधिकार को बड़ी चुनौती मिली। तेरे मेरे सपने की रिकॉर्ड पॉलीडोर ने जारी किये थे। प्रतिस्पर्धा के दौर में HMV ने तत्कालीन कॉपीराइट कानून में खामियों का फायदा उठाकर सिने गीतों के वर्शन रिकॉर्ड जारी करना शुरू कर दिया। इसी कड़ी में HMV का हे मैंने कसम ली और जीवन की बगिया का वर्शन संस्करण बहुत चर्चित रहा जिसमें किशोर कुमार का साथ सुलक्षणा पंडित ने दिया था। इस गीत की रिकॉर्डिंग के संदर्भ में यह कहानी प्रचलित है कि उस दिन मुंबई में भारी वर्षा से जलजमाव के कारण अधिकांश साज़िंदे स्टूडियो नहीं पहुंच सके और सचिनदेव बर्मन को गीत की धुन बदलना पड़ी। पर बारिश वाला यह किस्सा भ्रामक है। इसके पीछे अनेक तर्क हैं – 1.यह फ़िल्म मई माह में प्रदर्शित हुई और जीवन की बगिया इस फ़िल्म का अंतिम रिकॉर्डेड गीत था। संभवतः इसे मार्च या अप्रेल में रिकॉर्ड किया गया जब मुंबई में भारी वर्षा नहीं होती। 2. जिस तरह सचिनदेव बर्मन स्टूडियो तक पहुंच गये वैसे ही उनके ही घर में रहने वाले पंचम भी आ सकते थे। 3.गाने की रिकॉर्डिंग में काफी संख्या में तकनीकी स्टाफ लगता है। वह इतनी बारिश में स्टूडियो तक कैसे पहुंचा?
मन को आल्हादित करते इस गीत के जन्म का वास्तविक किस्सा यह है कि जिस दिन इस गीत की रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो बुक था,उस दिन राहुल देव बर्मन अपने सहायकों बासु-मनोहारी और मारुति कीर के साथ किसी फ़िल्म के गीतों की रिकॉर्डिंग के लिए चेन्नई में थे। उन दिनों बर्मन पिता पुत्र का वाद्य वृंद एक ही था। जीवन की बगिया महकेगी के लिए धुन भी तैयार थी। सचिन देव बर्मन ने स्टूडियो आते ही लता,किशोर, शिव कुमार शर्मा,हरि प्रसाद चौरसिया और एक तबला वादक को स्टूडियो बुलाया। उन्होंने इस गीत की प्रसव पीड़ा को झेलकर एक अलग धुन को जन्म दिया। सिर्फ़ तीन साज़। बांसुरी,संतूर और तबला। और क्या विलक्षण गीत का अविष्कार हुआ। जीवन की बगिया महकेगी। पूरा स्टूडियो इस अभिनव प्रयोग की सुगंध से महक उठा। इस बुजुर्ग संगीतकार ने न सिर्फ़ स्टूडियो का किराया बचाया,बल्कि अपने चातुर्य, अनुभव और कल्पनाशीलता से एक गीत की धुन का स्वरूप ही बदल दिया।

आपने यह गीत कईं बार सुना होगा। पर इसकी जन्मकथा के संदर्भ में इसे एक दफ़ा फिर सुनिए। संतूर की तरंगों को महसूस कीजिए। बांसुरी की तान का आनंद उठाइए। तबले की मद्धम थाप में खो जाइये। और प्रणाम कीजिए नीरज की लेखनी को। सजदा कीजिए सचिनदेव बर्मन को जिनका संगीत पैंसठ साल की आयु में भी बाली उमर का रहा। नमन कीजिए शिव हरि की उस मनोहारी जुगलबंदी को। दाद दीजिए लता और किशोर के मन को स्पंदित करते गायन को। फ़िल्म तेरे मेरे सपने की कहानी चिकित्सा के पवित्र पेशे को समर्पित है। इसका केंद्रीय पात्र आनंद (देव आनंद) एक आदर्शवादी चिकित्सक है। वह जनसेवा के उद्देश्य से छिंदवाड़ा (म.प्र.) जिले में कोयले की खदान वाले क्षेत्र के एक गांव में नौकरी करता है। उसकी मुलाकात डॉ.जगन (विजय आनंद) से होती है जो हताशा में नशेड़ी बन चुका है। आनंद जगन को इस स्थिति से उबारता है। गांव की अध्यापिका निशा (मुमताज़) और आनंद प्रेम के बंधन में बंधकर शादी कर लेते हैं। आनंद और निशा को वैवाहिक जीवन में नित नये संकटों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि गर्भवती निशा एक सड़क हादसे का शिकार हो जाती है और अजन्मे बच्चे को खो देती है। उसके पुनः मां बनने की संभावना भी धूमिल हो जाती हैं। परिस्थितियां आनंद को मुंबई ले आती हैं जहां वह एक प्रसिद्ध अभिनेत्री मालती (हेमा मालिनी) के संपर्क में आता है। चकाचौंध की ज़िंदगी जी रही मालती के चेहरे में छुपे एकाकीपन से पिघलकर आनंद उसकी ओर आकर्षित होकर निशा से दूर होता जाता है। अंत में निशा फिर से गर्भवती होकर बच्चे को जन्म देती है। आनंद भौतिकवाद के चक्रव्यूह से निकल आता है। उसे अपनी गलती का एहसास होता है और आनंद एवं निशा के सपने पूरे होते हैं।
चर्चारत गीत फ़िल्म में एक निर्णायक मोड़ पर आता है। आनंद और निशा के जीवन में
मालती के आ जाने से खलबली मची हुई है। दोनों भारी तनाव में तथा असहज हैं। तभी निशा को पता चलता है कि वह गर्भवती है। वह आनंद को यह खुशखबर देती है। आनंद भी आनंदित हो जाता है। दोनों आने वाले नन्हे मेहमान के सपने संजोने लगते हैं।
लता के शहद से पगे स्वर में गीत आरंभ होता है, मानो वे नायिका के गर्भ में अंकुरित हो रहे भ्रूण के लिए लोरी गा रही हों। सचिनदेव बर्मन ने इस गाने में एक अभिनव प्रयोग किया है। गीत का मुखड़ा लता के स्वर में है। पहले अंतरे में लता की तीन पंक्तियों के बाद किशोर बड़े ही कोमल अंदाज़ में गाते हैं – वो सपना। फिर से लता – मेरा होगा। इसी क्रम को हर अंतरे में दोहराया गया है। हिंदी सिने संगीत के इतिहास में यह अभिनव प्रयोग बड़ा सुहाना लगता है।
बांसुरी और संतूर ने तो सुरों की ऐसी अमृतवर्षा की है कि लगता है इस गीत की इससे बेहतर धुन हो ही नहीं सकती थी। इन दो वाद्यों ने वह जादू जगाया है जो अनेक साजिंदों का विराट ऑर्केस्ट्रा भी नहीं कर सकता था। ये दोनों साज़‌ इस नग़्मे‌ की आत्मा हैं।
किसी भी दंपति के लिए नई पीढ़ी के आगमन का समाचार सबसे शुभ होता है। जब विवाहित स्त्री को उसके गर्भ में पल रहे नवांकुर का सुखद एहसास होता है,तब पूरे परिवार में नयी उमंग, नये उत्साह का संचार होता है। कवि नीरज ने इस गीत में इसी प्रसंग के अनुरूप तरल भाव अभिव्यक्त किये हैं।
कितना सुहाना पल। मुट्ठी में कैद कर रखने जैसा। आने वाले शिशु के रूप में जीवन की बगिया में बहार आयेगी। नीरज ने काव्यात्मक शैली में शब्दशिल्प गढ़ा है। महकेगी से तात्पर्य बच्चे के आगमन से जीवन रूपी बाग सुगंधित हो जायेगी। लहकेगी मतलब हवा के झोंके से हिलेगी। यहां उनका अभिप्राय खुशी से मन डोलेगा है। चहकेगी मतलब इस खुशी में बाग के पक्षी भी कुंजन कर शामिल हो जायेंगे। प्रसन्नता के इस वातावरण में अरमानों,आकांक्षाओं की कलियां झूमेंगीं,झूलेंगीं और फूलेंगीं।
पहले अंतरे की पक्तियों में समर्पण है। प्रेम है। जो बच्चा गर्भ में पल रहा है वह दोनों का है। भगवान से मांगा हुआ वरदान पूर्णत्व की ओर है। एक सपना सच होने जा रहा है। उस शिशु के मुस्कुराने मात्र से जीवन में सवेरा हो जायेगा। उसकी एक किलकारी से हमारा बचपन लौट आयेगा। घर आंगन नंदनवन बन जायेगा।
दूसरे अंतरे में नीरज ने आत्मीय दृश्य की कल्पना की है। बच्चे के आगमन से माता पिता के बीच बंधन और बढ़ेगा। भले ही वह धागा अभी कच्चा है पर यह बंधन अटूट रहेगा। यहां किशोर कुमार के स्वर में आश्वासन है। पति और पिता की ज़िम्मेदारी का एहसास है। तीसरे अंतरे में निर्देशक ने पलने का चित्रण कर सार्थक सन्देश दिया है। यहां लता के स्वर में एक मां के सुखद स्वप्नों की अभिव्यक्ति है। बच्चा मां बाप के लिये प्राणों से बढ़कर होता है। उसका पालन पोषण उनके लिए सर्वोपरी है। माता की अपेक्षा है कि उसका बच्चा बड़ा होकर परिवार का नाम रोशन करे। जैसे जैसे वह बड़ा होगा,मां बाप के स्नेहबंध की घनिष्ठता बढ़ेगी। मुमताज़ के ममतामयी अभिनय ने इस गीत को अविस्मरणीय बना दिया है।
लता –
जीवन की बगिया महकेगी
लहकेगी,चहकेगी
खुशियों की कलियां झूमेंगीं
झूलेंगी़,फुलेंगीं
जीवन की बगिया
वो तेरा होगा,वो सपना मेरा होगा II1II
मिलजुल के मांगा,वो तेरा मेरा होगा
जब जब वो मुस्कुराएगा
अपना सबेरा होगा
थोड़ा हमारा,थोड़ा तुम्हारा
आयेगा फिर से बचपन हमारा
जीवन की बगिया…
किशोर –
हम और बंधेंगे,हम तुम कुछ और बंधेंगे II2II
होगा कोई बीच तो हम कुछ और बंधेंगे
बांधेगा धागा कच्चा,हम तुम तब और बंधेंगे
थोड़ा हमारा थोड़ा तुम्हारा…
लता –
मेरा राजदुलारा,वो जीवन प्राण हमारा II3II
फूलेगा इक फूल,खिलेगा प्यार हमारा
दिन का वो सूरज होगा
रातों का चांद सितारा
थोड़ा हमारा थोड़ा तुम्हारा..
वर्तमान परिदृश्य में बच्चे के जन्म की योजना दुष्कर हो चली है। एकल परिवार,विशेषकर कामकाजी दंपति में बच्चे की परवरिश की कल्पना कठिन हो गई है। महानगरों में विलासिता के पीछे भाग रही भीड़ को फुर्सत ही नहीं है कि वह वंशवृद्धि के बारे में विचार करे। संतान न चाहने वाली या निःसंतान दंपति की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में शायद यह गाना एक रामबाण उपाय है। यदि बच्चे की चाहत न रखने वाले दंपति इस अनुपम गीत को सुनें तो उनकी सोच बदल सकती है। शायद उन्हें झूलता हुआ पलना याद जाये और वे बच्चे के अभिभावक बन जीवन की बगिया की महक का अनुभव कर सकें।

श्रीधर कामत

9826824680

चुनिंदा अंश शैलेश कुलकर्णी की पोस्ट से साभार

भाग – 58 रात अंधेरी दूर सवेरा

प्रेम में स्वार्थ की कोई गुंजाइश नहीं होती। सच्चा प्रेम समर्पण और त्याग की नींव पर जन्म लेता है। परंतु प्रेम के बीज के अंकुरण से पहले ही उसमें ग्रहण लग जाए तो प्रेमी पीछे हट जाता है। अपने दिल से निकली आह के कड़वे घूंट पीकर वह अपने प्यार की कुर्बानी दे देता है।
हिंदी सिनेमा में प्रेम में त्याग के प्रसंग के अनेक गीत हैं। भावनात्मक होने के कारण इनमें से अनेक तराने लोकप्रिय हुए हैं। गीत गाथा इस अंक में एक ऐसा नग़्मा लाई है जिसमें प्रेमी के दिल की तड़प है,व्याकुलता है,आह है। संवेदनाओं के भंवर में फंसा यह गाना है – रात अंधेरी दूर सवेरा (आह/मुकेश/शंकर जयकिशन/हसरत जयपुरी)।
चित्रपट आह के सभी नौ गीत मशहूर हुए थे। इनमें से चार शैलेंद्र ने लिखे थे – जो मैं जानती उनके लिए,ये शाम की तन्हाइयां और राजा की आयेगी बारात(तीनों लता) एवं छोटी सी ये ज़िंदगानी रे (मुकेश)। आलोच्य गीत के अलावा चार अन्य गाने हसरत की कलम से निकले – आजा रे अब मेरा दिल पुकारा और जाने न नज़र पहचाने जिगर (दोनों लता,मुकेश), झनन झनन घुंघरवा बाजे तथा सुनते थे नाम हम (दोनों लता)। चर्चारत गीत राज कपूर पर चित्रित एकमात्र एकल गीत था।

आह (1953) आर.के. फ़िल्म्स के बैनर तले प्रदर्शित आग, बरसात और आवारा के बाद चौथी फ़िल्म थी। इसमें राज कपूर ने टी.बी.(तपेदिक) की बीमारी से जूझ रहे नायक के निश्छल प्रेम की कहानी को रुपहले पर्दे पर उतारा। गंभीर विषय होने के कारण अत्यधिक लोकप्रिय गीत संगीत के बावजूद आह औसत व्यवसाय ही कर सकी। फ़िल्म का निर्देशन राजा नवाथे ने किया। कथा, पटकथा तथा संवाद इंदर राज आनंद के थे। छायांकन जयवंत पाठारे का था।
मूल फ़िल्म के अंत में नायक राज के आग्रह पर उसका मित्र नायिका से विवाह कर लेता है। इस शादी में शामिल होने आ रहे बीमार नायक की तांगे में ही मृत्यु हो जाती है। फ़िल्म के विज्ञापन में राज कपूर के चित्र के पीछे नर कंकाल दर्शाकर संदेश छापा गया था – निःस्वार्थ प्रेम की वेदी पर उसे अपने जीवन की आहुति देना पड़ी। लेकिन दर्शकों को यह दुःखांत पसंद नहीं आया। फ़िल्म आह को आर.के. फ़िल्म्स के चलचित्रों जैसी सफलता नहीं मिली। इसपर राज कपूर ने फ़िल्म का अंत नायिका की नायक से शादी में बदल दिया। इसके बावजूद यह फ़िल्म औसत प्रदर्शन ही कर सकी।
राज कपूर के चलचित्रों में संगीत का बड़ा महत्व होता था। उनके गीतों के अत्यंत लोकप्रिय होने का कारण सिने संगीत सम्राट शंकर जयकिशन का टीम वर्क और राज कपूर की पारखी नज़र थी। राज कपूर अकेले ऐसे फ़िल्मकार थे जो गीतों के जन्म से लेकर उनकी रिकॉर्डिंग तक पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनते थे।
चर्चारत गीत की धुन जयकिशन द्वारा रची गई है। मुकेश के दर्दीले स्वर ने इसमें ऐसी प्राणप्रतिष्ठा की है मानो वेदना की आह निकल रही हो। राज कपूर ने अपने मार्मिक अभिनय से इस गीत को महिमामंडित किया है। राज कपूर फ़िल्म निर्माण की बारीकियां सीखते हुए जवान हुए थे। अभिनय करते समय उनके भीतर का निर्देशक उनसे बेहतर अदाकारी करवा लेता था। इस बात का अनुभव कईं निर्देशकों ने किया है। फ़िल्म में उस दौर के कुप्रसिद्ध खलनायक प्राण ने सच्चे मित्र की सकारात्मक भूमिका निभाई थी।
भारतीय सिनेमा में राज कपूर और नर्गिस की जोड़ी को सबसे लोकप्रिय माना जाता है। देव आनंद- सुरैया,दिलीप कुमार – मधुबाला की तरह राज कपूर – नर्गिस की जोड़ी भी टूट गई। उसके बाद राज कपूर फ़िल्मकार से शोमैन बन गये।
गीतकार हसरत जयपुरी यूं तो प्रेम गीतों के लिए जाने जाते हैं। उनके लिखे सुकुमार चंचल नगमों पर जब जब शंकर जयकिशन के चमकीले संगीत का सिंगार हुआ, एक से बढ़कर एक शोख और मस्तीभरे तरानों का सृजन हुआ है। किंतु हसरत की लेखनी से अवतरित कुछ ऐसे गीत हैं जो अत्यंत गंभीर मूड के हैं,उदासी की चादर ओढ़े हैं। सहसा विश्वास नहीं होता कि इनकी रचना हसरत ने की। इनमें रसिक बलमा और जाने कहां गये वो दिन शामिल हैं।
इस फ़िल्म की धुनों के भी कुछ किस्से हैं। आह से कुछ माह पहले प्रदर्शित फ़िल्म पापी में भी राज कपूर और नर्गिस की ही जोड़ी थी। इस फ़िल्म में एस.मोहिंदर का स्वरबद्ध किया आशा भोसले का गाया एक गीत कौन कहे उनसे जाके ऐ हुज़ूर राज कपूर को इतना पसंद आया कि उन्होंने एस.मोहिंदर से इस गीत को अपनी फ़िल्म के लिए मांग लिया। पर तब तक एस.मोहिंदर इसे पापी के लिए रिकॉर्ड कर चुके थे। उनके मना करने पर राज कपूर ने इसी धुन पर शंकर जयकिशन से राजा की आयेगी बारात बनवाया।
फ़िल्म के एक प्रसंग में बीमार नायक अपने डॉक्टर मित्र से नायिका का हाथ थामने की ज़िद करता है। इस दृश्य के पार्श्व में वायलिन की उदास धुन बजती है। बाद में इसमें कोरस भी शामिल हो जाता है। सत्रह साल बाद शंकर जयकिशन ने इसी हृदयविदारक धुन पर जाने कहां गये वो दिन की रचना की। यह इस महान संगीतकार जोड़ी की प्रतिभा का कमाल था। जीवन की नश्वरता दर्शाता गीत छोटी सी ये ज़िंदगानी सिनेमा के पर्दे पर स्वयं पार्श्वगायक मुकेश गाते नज़र आते हैं। उन्होंने एक तांगेवाले की छोटी सी अतिथि भूमिका निभाई थी। राज कपूर की ही फ़िल्म बूट पॉलिश के गीत चली कौनसे देश गुजरिया तू सज धज के में गीतकार शैलेन्द्र ने केमरे का सामना किया था।
इस फ़िल्म का नायक राज (राज कपूर) एक निर्माण कंपनी के मालिक का बेटा है। राज के पिता उसकी शादी अपने मित्र की बड़ी बेटी चंद्रा (विजयलक्ष्मी) से करना चाहते हैं। राज पिता के आग्रह पर चंद्रा को एक पत्र लिखता है। चंद्रा इस चिट्ठी में कोई दिलचस्पी नहीं लेती। उसकी छोटी बहन नीलू (नर्गिस) चंद्रा के नाम से इस खत का जवाब भेजती है। राज और नीलू के बीच पत्रव्यवहार चलता है। संयोग से दोनों मिलते हैं पर एक दूसरे को पहचानते नहीं। एक दिन राज को पता चल जाता है कि चिट्ठी लिखने वाली लड़की चंद्रा नहीं नीलू है। दोनों में प्रेम हो जाता है। राज को टी.बी.की बीमारी हो जाती है। उसके दोस्त डॉ. कैलाश (प्राण) को पता चलता है कि राज कुछ ही दिनों का मेहमान है। राज को ईलाज हेतु सेनेटोरियम में रहना पड़ता है। वह नीलू से दूरी बना लेता है और उसकी नज़रों में गिरने के लिए चंद्रा से प्रेम का नाटक करता है। इतना ही नहीं वह कैलाश पर नीलू से शादी करने का दबाव डालता है। नीलू राज की इस बेवफाई से दुःखी होकर कैलाश से विवाह हेतु राजी हो जाती है। अंत में राज की कुर्बानी का भेद खुलता है। नीलू उससे शादी कर लेती है और राज स्वस्थ हो जाता है।
इस गीत में राज कपूर की देहभाषा में मौत के तांडव का खौफ नज़र आता है। उन्होंने अपनी आंखों से उस भय को अभिव्यक्त किया है। संवेदनाओं के भंवर में घिरे नायक की भूमिका में राज कपूर दर्शकों की सहानुभूति बटोर ले जाते हैं। इस निराशावादी गीत में वही मर्म,वही पीड़ा झलकती है जो राज कपूर पर ही चित्रित और मुकेश के ही गाये गीत ज़िंदा हूं इस तरह के ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं (आग/ राम गांगुली /बेहज़ाद लखनवी) में नज़र आई थी।
एक अन्य युगल गीत आजा रे अब मेरा दिल पुकारा में हसरत की पंक्तियां मुकेश के हिस्से आईं हैं – मौत मेरी तरफ आने लगी,जान तेरी तरफ जाने लगी। और तूने देखा न होगा ये समां,कैसे जाता है दम को देख ले। हसरत ने मौत के दरवाजे पर खड़े राज की बेबसी बयां कर दी है। शंकर जयकिशन ने इस गंभीर गीत को उस दौर की परंपरागत मातमी धुन से हटकर मेलडी में पेश किया है।
चर्चारत गीत सिनेमा के पर्दे पर उस समय आता है जब राज अपनी लाईलाज बीमारी और सामने खड़ी मौत से जूझते हुए हताश होकर एक कठोर निर्णय लेता है। वह किसी तरह नीलू से दूर होना चाहता है। इसके लिए वह चंद्रा से प्रेम का स्वांग रचने का फ़ैसला लेता है। वह रात राज के लिए बहुत भारी और पीड़ादायक है। अगले दिन उसे एक ऐसा झूठ बोलना है जिसके कारण उसकी प्रिय नीलू का दिल टूट जायेगा। राज आत्मग्लानि से तड़पते हुए गीत के माध्यम से अपना दर्द बयां करता है।
राज के लिए वह स्याह काली रात है। उसने जो कठोर निर्णय लिया है उसके कारण अब उसके जीवन में कभी सूर्योदय नहीं होगा।
अब राज के सिर पर मृत्यु का साया मंडरा रहा है। यह बीमारी उसकी जान ले लेगी। और अपनी चांद सी सुंदर प्रेमिका को उसने खुद से दूर कर लिया है।
राज अपनी करनी का मातम मना रहा है। उसकी आह भी रुआंसी हो गई है। अब उसकी सोचने समझने की शक्ति खत्म हो चली है। राज के लिए समय थोड़ा ही बचा है। अब उसका कोई संगी साथी नहीं है। हमसफ़र है तो सिर्फ़ मौत।
रात अंधेरी दूर सवेरा
बर्बाद है दिल मेरा
आना भी चाहे
आ ना सके हम
कोई नहीं आसरा -2 II1II
खोयी है मंज़िल
रास्ता है मुश्किल
चांद भी है छुपा
रात अंधेरी…
आह भी रोये
राह भी रोये
सूझे न बात कोई -2II2II
थोड़ी उमर है
सूना सफ़र है
मेरा न साथ कोई
रात अंधेरी…
इंसान खुद नहीं जानता कि उसकी क़िस्मत में क्या लिखा है। वह अपनी हाथों की लकीरों को अपने ढंग से नहीं गढ़ सकता। राज कपूर ने आम दर्शक को केंद्रित कर जो सिनेमा बनाये वे बहुत चले। पर जब वे गंभीर विषय की ओर मुड़े, उन्हें निराश होना पड़ा। राज कपूर नियति को तो बदल नहीं सकते थे पर उन्होंने इस फ़िल्म के दुःखांत को बदल दिया। यदि वे ऐसा न करते तो आह भी कुछ साल बाद कागज़ के फूल और तीसरी कसम की तरह क्लासिक फिल्म मानी जाती। आह एक संदेश परक सिनेकृति थी जो शायद समय से पहले प्रदर्शित हो गई वर्ना राज कपूर के लिए रात अंधेरी नहीं होती,सवेरा दूर नहीं होता।

श्रीधर कामत

9826824680

मार्गदर्शन-श्रीकांत परांजपे

9752016674

भाग – 57 इक प्यार का नग़्मा है

ध्वनि तरंगें अगर सुर में हों तो वह दिलकश संगीत होता है और यदि कर्कश हों तो शोर पैदा होता है। संगीत जितना मनमोहक होता है,शोर उतना ही कष्टप्रद। आजकल चित्रपट संगीत में सुर कम और शोर ज़्यादा हो गया है। साथ ही विश्व में ध्वनि प्रदूषण विस्फोटक रूप धारण कर आज की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। मनुष्य शांति चाहता है और शोर है कि थमने का नाम ही नहीं लेता।
शोर की वैश्विक समस्या पर फ़िल्मकार मनोज कुमार ने एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम ही शोर (1972) था। इस चित्रपट का एक बेहद रूहानी नग़्मा था – इक प्यार का नग़्मा है(मुकेश, लता/लक्ष्मीकांत प्यारेलाल/संतोष आनंद)। गीत गाथा में किस्सा इस मशहूर गीत का और विशेष रूप से इसके दो अंतरों का जो गीत में शामिल नहीं किये जा सके। इस गीत की विशेषता यह है कि फ़िल्म में इसके चार संस्करण हैं। वे भी अंतरे सहित। किसी फ़िल्म में एक ही गीत के अलग अलग अंतरों में दो से अधिक बार बजने के कुछ उदाहरण हैं – जब जब बहार आई (तक़दीर/ रफ़ी ,लता और महेंद्र कपूर,उषा मंगेशकर के स्वर में) और तू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है (आप तो ऐसे ना थे/रफ़ी,मनहर उधास और हेमलता के स्वर में)। राग यमन और बिलावल में निबद्ध शोर फ़िल्म का चर्चारत गीत सिर्फ़ मुकेश और लता की आवाज़ में कभी दोगाने के तो कभी एकल गीत के रूप में है।
चित्रपट शोर के निर्माता, निर्देशक,कहानीकार और संपादक स्वयं मनोज कुमार थे। इस फ़िल्म का छायांकन नरीमन ईरानी ने किया था जो नयनरम्य और तकनीकी दृष्टि से आधुनिक भी था। आलोच्य गीत के पहले संस्करण में उन्होंने परावर्तन से प्रतिबिम्ब का तिलिस्म रचकर दर्शकों को हतप्रभ कर दिया था। फ़िल्म में एक गीत वर्मा मलिक का था – बन के दुल्हनिया आज चली हूं मैं साजन के द्वारे (लता)। दो गाने राजकवि इंद्रजीत सिंह तुलसी ने लिखे- पानी रे पानी तेरा रंग कैसा (लता,मुकेश) और जीवन चलने का नाम (महेंद्र कपूर, मन्ना डे और श्यामा चित्तार)। संतोष आनंद के हिस्से शीर्षक गीत भी आया – ज़रा सा उसको छुआ तो उसने मचा दिया शोर (लता)।
शोर फिल्मफेयर (1972) के अनेक संवर्गों में नामित थी जैसे – सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, कहानी लेखक और संपादक (मनोज कुमार),छायांकन (नरीमन ईरानी), सहायक अभिनेता (प्रेमनाथ), संगीत(लक्ष्मीकांत प्यारेलाल), गीत (संतोष आनंद) और गायक (मुकेश) पर इसे सिर्फ़ सर्वश्रेष्ठ संपादन का पुरस्कार मिला।
कुछ फ़िल्म समीक्षक मनोज कुमार की अभिनय क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। पर एक बात तो तय है कि वे एक सफल फ़िल्मकार रहे हैं। कैमरे के कोण,संवाद,चरित्र और प्रसंग के अनुसार गीत पिरोने की उनकी समझ समय से परे रही है। उपकार में कसमे वादे प्यार वफ़ा सब का अंतरा याद कीजिए। आसमान में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जायेगा। इसके दृश्य में प्रेम चोपड़ा पर फोकस कैमरा ऊपर से धीरे धीरे नीचे आता है। मलंग बाबा का ऐतिहासिक किरदार प्राण पर मनोज कुमार का उपकार ही था।
शहीद,उपकार तथा पूरब और पश्चिम जैसे राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत सिनेमा बनाने के बाद मनोज कुमार ने‌ सामाजिक और पर्यावरण से जुड़े विषय को हाथ में लिया।‌ नई कहानी में गीत पिरोने के लिये गीतकार भी नये लिए। उनकी फ़िल्मों में अब तक यादगार संगीत दे चुकी कल्याणजी आनंदजी की जोड़ी की जगह लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने ली। गीत संगीत की नई बयार लेकर आई फ़िल्म शोर का सुरीला संगीत अत्यंत लोकप्रिय हुआ।
ग्रंथपाल की नौकरी के दौरान संतोष आनंद का मन साहित्य में ऐसा रमा कि वे कविता करने लगे। मुशायरों और कवि सम्मेलनों में शिरकत से पहचान बनी। मनोज कुमार की फ़िल्म पूरब और पश्चिम से बतौर गीतकार पदार्पण हुआ। संतोष और आनंद सुखी जीवन की गाड़ी के दो पहिये हैं। गीतकार संतोष आनंद के नाम में ये स्वयंसिद्ध थे। लेकिन एक समय ऐसा आया कि जीवन से संतोष रूठकर चला गया और आनंद ने भी नाता तोड लिया। एक समय प्रसिद्धि के शिखर को स्पर्श कर चुका यह कवि युवा बेटे की आत्महत्या के बाद तंगी और गुमनामी के अंधेरों में खो गया।
संतोष आनंद भारतीय साहित्य में एक ऐसा मान्यवर नाम है जिसकी काव्यधारा के स्पर्श से अनेक फ़िल्मों को माणिक मोती जैसे गीत मिले। पूरब और पश्चिम के एकमात्र गीत पूरवा सुहानी आई रे पूरवा की पंक्ति याद कीजिये। मौसम का मुसाफ़िर खड़ा रस्ते में,उसके हाथों सब कुछ बिका सस्ते में। या फिर मैं ना भूलूंगा की पंक्तियां – मैं मन को मंदिर कर डालूं तू पूजन बन जा। मंदिर से पूजा का रिश्ता मैं ना भूलूंगा। ऐसा लगा शैलेंद्र का पुनर्जन्म हो गया। उसके बाद शब्दशिल्प की झड़ी लग गई। मैं ना भूलूंगा (रोटी,कपड़ा और मकान) तथा मोहब्बत है क्या चीज़ (प्रेम रोग) के लिए उन्हें फिल्मफेयर मिला। मेघा रे मेघा रे(प्यासा सावन) ज़िंदगी की न टूटे लडी (क्रांति) और ओ रब्बा कोई तो बताए (संगीत) उनकी साहित्यिक शैली में लिखे उल्लेखनीय गीत हैं। एक टी.वी. कार्यक्रम में गायिका नेहा कक्कड़ द्वारा पांच लाख रूपये का चेक देने पर स्वाभिमानी संतोष आनंद भावुक हो गये थे।
इस गीत की आत्मा नंदा हैं जो इस फ़िल्म में अतिथि भूमिका में थीं। उनका किरदार छोटा होकर भी इतना सशक्त है कि इस एक गीत के माध्यम से पूरी फ़िल्म पर छाया रहता है। खासकर इक प्यार का नगमा है गीत में। इस चरित्र को निभाने के लिए कोई भी अभिनेत्री राज़ी नहीं थी। किसी मित्र की सलाह पर मनोज कुमार ने झिझकते हुए नंदा के समक्ष यह प्रस्ताव रखा। नंदा ने कहानी सुनकर न सिर्फ हामी भरी बल्कि इस भूमिका के लिए पारिश्रमिक भी नहीं लिया। भावनाप्रधान अभिनय के लिए ख्यात नंदा ने गीता के छोटी सी अतिथि भूमिका को भव्यता प्रदान की।
प्रेमनाथ किसी समय नायक या सहनायक हुआ करते थे। तक़दीर पलटी और वे तीसरी मंज़िल एवं जॉनी मेरा नाम में खलनायक के रूप में पर्दे पर नज़र आये। चलचित्र शोर में मनोज कुमार ने प्रेमनाथ को अभिनय के उसी मोड पर ला खड़ा किया जहां उन्होंने कभी प्राण को उपकार में स्थापित किया था। इस फ़िल्म के बाद प्रेमनाथ एक कामयाब चरित्र अभिनेता बने।
चित्रपट शोर की कहानी एक गरीब श्रमिक पिता और उसके मूक पुत्र के संघर्ष की दास्तां है। शंकर (मनोज कुमार) एक रेल दुर्घटना में अपनी पत्नी गीता (नंदा) को खो चुका है। इस हादसे में उसका किशोर पुत्र दीपक (सत्यजीत) आवाज़ खो देता है। उसके ऑपरेशन के लिए शंकर कारखाने की नौकरी के बाद साईकल चलाने का कीर्तिमान बनाकर रुपये इकट्ठा करता है। बस्ती का बाशिंदा बादशाह (प्रेमनाथ) उसकी मदद करता है। बस्ती की गरीब युवती रानी (जया भादुड़ी) दीपक से हिल मिल जाती है और शंकर से प्रेम करने लगती है। दीपक तो ऑपरेशन से ठीक हो जाता है पर शंकर दुर्घटना का शिकार होकर श्रवण शक्ति खो देता है। इस तरह शंकर का दीपक की आवाज़ सुनने का सपना अधूरा रह जाता है। अंत में शंकर रानी और दीपक के साथ जीवन यात्रा पर निकल पड़ता है।
इक प्यार का नग़्मा है फ़िल्म शोर में चार बार होता है। एक बार मद्धम चाल में सुहाने मूड में और तीन बार धीमी चाल में उदास मूड में। सबसे पहले यह गीत पर्दे पर तब आता है जब शंकर,गीता और दीपक पिकनिक मनाने समुद्र किनारे आते हैं।दूसरी बार यह सिर्फ़ मुकेश के स्वर में है। शंकर गीता की याद में गाता है। यह संस्करण उदासी ओढ़े हुए है और धीमी चाल में है। इसके अंतरे मूल दोगाने से अलग हैं। तीसरी बार यह गीत शंकर दीपक के ऑपरेशन के लिए राशि एकत्र हो जाने पर गाता है जिसमें कोरस भी है और रानी उसका साथ देती है। चौथी और अंतिम बार गाना दीपक शुरू करता है और शंकर बाद में सुर मिलाता है। यह बहुत ही धीमी चाल में है और इसमें इसमें वाद्य भी बहुत कम बजे हैं। इसके पहले अंतरे की चार पंक्तियां वही हैं पर अंत की दो पंक्तियां अलग हैं।
इक प्यार का नग़्मा है सिर्फ़ एक गीत नहीं, मानवीय संवेदनाओं की काव्यधारा है। इसमें जीवन का दर्शन समाया हुआ है। यह रचना सुनकार के अंतर्मन को झकझोर देती है। रिश्ते नातों में स्थिरता स्वरों के ठहराव की तरह होती है। संतोष आनंद ने गागर में सागर भर दिया है। गीत की नज़ाकत को देखते हुए एल. पी. ने इसकी धुन भी सरल बनाई है। कहीं भारी भरकम ऑर्केस्ट्रा नहीं। सुरों का उतार चढ़ाव भी नहीं। गीत विस्तीर्ण नदी के अविरल प्रवाह की तरह मंद मंद बहता जाता है। गाने के आरंभ में लता की मधुर हमिंग और उसके साथ वायलिन की सुरीली जुगलबंदी। इस धुन की संकल्पना लक्ष्मीकांत की थी। यह रचना एल.पी. की सुरीली संगीतयात्रा की कहानी भी है।आंखों में समंदर है में लता अपनी आवाज़ में समुद्र का एहसास दिला जाती हैं। उन्होंने ज़िंदगी और कुछ भी नहीं में और को खींचकर गाया है जबकि कुछ में स्वरों का ठहराव है। यही इस महान गायिका का चमत्कारिक गायन है। मुकेश ने इस गीत में विरह की वेदना उंडेल दी है। अन्य संस्करणों में कोरस का प्रयोग कर दार्शनिक संदेश दिया गया है।
जीवन प्रेम की कविता है जिसमें लहरों का प्रवाह है। वैवाहिक जीवन का बंधन अटूट है। यह दो दिलों की दास्तां है। अर्जित किया हुआ खो देना और खोया हुआ फिर से प्राप्त कर लेना ही जीवन है। आयुष्य के लिए दो क्षण पर्याप्त हैं। यदि इन दो क्षणों का अनुभव लेने से चूक गये तो जीवन व्यर्थ है। पति पत्नी को नदिया की धारा और किनारे की तरह साथ साथ चलना है। दोनों एक दूसरे का आधार हैं। उनकी आंखों में विशाल समुद्र सा खारा पानी समाया हुआ है जो आशा का प्रतीक है।
ज़िंदगी में चुनौतियों के कईं तूफ़ानों का सामना करना पड़ता है। संकट के बादल मंडराकर छंट जाते हैं। आकाश फिर से नीला हो जाता है। परछाइयां अपने पीछे निशानियां छोड़ जाती हैं।
शंकर यह अंतरा दीपक को समर्पित करता है। वह दीपक का स्वर सुनने के लिए लालायित है। जो हृदय को सुकून दे ऐसा कोई वाद्य ले आओ। मेरी (शंकर) मृत्यु से पहले दीपक की आवाज़ ले आओ। उल्लास का राग है। आंसुओं की भाषा है।
गीत के अंतिम अंतरे में पिता पुत्र की मिश्रित भावनाएं निहित हैं। दीपक बोल सकता है यह जानकर शंकर खुश है। उसे दीपक की आवाज़ नहीं सुनाई देगी इसका रंज नहीं है। पर दीपक को इस बात का दुख है कि उसकी पुकार पिता के कानों तक नहीं पहुंच सकेगी। पाकर खोना और खोकर पाना में यही दो बातें परिलक्षित हैं। शंकर दीपक को गले लगाकर दार्शनिक अंदाज़ में समझाता है कि जो नहीं है उसका शोक करने की बजाय जो है उसकी खुशी मनाना ही समझदारी है। अंततः दुनिया नश्वर है।
अब उन अंतरों का भावार्थ ग्रहण किया जाए जो इस ऐतिहासिक गीत में सम्मिलित नहीं किये गये। दरअसल यह कविता संतोष आनंद ने अपनी प्रेमिका के लिए लिखी थी जो उनसे बिछड़ गई। इन अंतरों के भाव के अनुसार इस जुदाई के बाद प्रेमी अकेला रह जाता है। फ़िल्म में शंकर के जीवन में गीता की खाली जगह रानी द्वारा भरना गीत के इन दो अंतरों की भावनाओं से मेल नहीं खाता। शायद इसीलिए ये दो बंद गीत में सम्मिलित नहीं किये गये।
भूतकाल कभी लौटकर नहीं आता। इस दिल पर सिर्फ़ तुम्हारा नाम लिखा हुआ है जो अमिट है। इसमें कोई और नहीं आ सकता। अब यह आशियां भस्म हो चुका है। इसकी राख उठाना शेष है।
तुम भले ही मेरा साथ न दो, मैं ज़िंदगी का यह सफ़र अकेला तय कर लूंगा। मैं हर संकट का सामना करने में सक्षम हूं। मुझे अपने आप पर भरोसा है कि मैं अपने कर्म से भाग्य गढ़ सकता हूं।

लता –
इक प्यार का नग्मा है
मौजों की रवानी है
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं
तेरी मेरी कहानी है
कुछ पाकर खोना है II1II
कुछ खोकर पाना है
जीवन का मतलब तो
आना और जाना है
दो पल के जीवन से
इक उम्र चुरानी है
ज़िंदगी और कुछ…
मुकेश –
तू धार है नदिया की II2II
मैं तेरा किनारा हूं
लता –
तू मेरा सहारा है
मैं तेरा सहारा हूं
आंखों में समंदर है
आशाओं का पानी है
ज़िंदगी और कुछ…
मुकेश –
तूफ़ान को आना है II3II
आकर चले जाना है
बादल है ये इक पल का
छाकर ढल जाना है
परछाइयां रह जातीं
रह जाती निशानी है
ज़िंदगी और कुछ…
जो दिल को तसल्ली दे II4II
वो साज़ उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही
आवाज़ उठा लाओ
खुशियों का तरन्नुम है
अश्कों की ज़बानी है
ज़िंदगी और कुछ…
कुछ पाकर खोना है II5II
कुछ खोकर पाना है
जीवन का मतलब तो
आना और जाना है
इस बात का ग़म ना कर
हर चीज़ तो फ़ानी है
ज़िंदगी और कुछ…

गीत के अप्रयुक्त अंतरे –
जो बीत गया है वो
अब दौर न आयेगा
इस दिल में सिवा तेरे
कोई और न आयेगा
घर फूंक दिया हमने
अब राख उठानी है
ज़िंदगी और कुछ…
तुम साथ न दो मेरा
चलना मुझे आता है
हर आग से वाकिफ हूं
जलना मुझे आता है
तदबीर के हाथों से
तक़दीर बनानी है
ज़िंदगी और कुछ…

जीवनसाथी का साथ नदी की धारा और किनारे के समान होता है। परस्पर प्रेम,आपसी समझ, विश्वास,त्याग और समर्पण की भावना से इस नदी की मौजों में रवानी आती है। सहजीवन में कोई भी संकट आये तो दोनों को मिल जुलकर उसका सामना करना पड़ता है। यही सुखी जीवन का मूल मंत्र है। यही प्रेम का काव्य है,जीवन की कहानी है। इसी में संतोष है और इसी में ही आनंद है।

श्रीधर कामत          डॉ.रमा गोळवलकर

9826824680       7798782051

भाग – 56 पूछो ना कैसे मैंने रैन बितायी

एक गीत के दो या अधिक संस्करण होना हिंदी फ़िल्मों में सामान्य बात है। इनमें से कभी-कभी सारे संस्करण लोकप्रिय हो जाते हैं तो कईं बार कोई एक श्रोताओं की पसंद पर खरा नहीं उतरता और रसिकों की विस्मृति में चला जाता है। कुछ गीतों का एक संस्करण तो सुनकार तक पहुंच ही नहीं पाता।
गीत गाथा अपने इस अंक में एक ऐसे ही गीत का अनसुना संस्करण आपसे रूबरू करा रही है। इसका एक संस्करण बहुत मशहूर हुआ जो कि एक उपशास्त्रीय रचना है। जिस गीत का उल्लेख हो रहा है वह विशुद्ध शास्त्रीय बंदिश है। यह गीत है – पूछो ना कैसे मैंने रैन बितायी (मेरी सूरत तेरी आंखें/सचिन देव बर्मन/शैलेंद्र)। इसे एक बार तो मन्ना डे ने गाया जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। इसी गीत का एक संस्करण शिवदयाल बातिश, मन्ना डे और रानू मुखर्जी ने भी गाया जो अल्पचर्चित है।
मेरी सूरत तेरी आंखें (1963) जीपी फ़िल्म्स के बैनर तले प्रदर्शित हुई। निहार रंजन गुप्त के उपन्यास उल्का पर आधारित इस फ़िल्म के निर्देशक थे आर.के.रखान। इसकी पटकथा लिखी फणि मुजुमदार और क़मर जलालाबादी ने और संपादन किया बिमल रॉय ने। गीतकार थे शैलेंद्र तथा संगीत दिया सचिनदेव बर्मन ने। राहुलदेव बर्मन सहायक संगीतकार थे।
तीन गायक और तीन गायिकाओं द्वारा गाये हुए इस चित्रपट के सभी गीत अत्यंत लोकप्रिय हैं। ये हैं – नाचे मन मोरा मगन (रफ़ी),ये किसकी ज़ुल्फ बिखरी (मुकेश,सुमन कल्याणपुर),तेरे बिन सूने नैन हमारे (रफ़ी, लता), तेरे खयालों में तेरे ही ख्वाबों में (लता) और तुझसे नज़र मिलाने में (आशा)।
आलोच्य बंदिश राग अहिर भैरव (ताल कहरवा) में निबद्ध है जो सचिनदेव बर्मन के आराध्य काज़ी नज़रूल इस्लाम का प्रिय राग था। काज़ी नज़रूल इस्लाम नामचीन बांग्ला लेखक, गीतकार और संगीतकार थे जिन्हें बांग्ला देश ने राष्ट्रकवि का सम्मान दिया। ऐसा माना जाता है कि सचिनदेव बर्मन यह बंदिश अपने उस्ताद को समर्पित करना चाहते थे।
इस प्रसिद्ध गीत का यह शास्त्रीय संस्करण मात्र ढाई मिनिट का है जिसमें स्थाई के अलावा अलाप और मुर्कियां ही हैं। इसमें कोई अस्थाई नहीं है। जो संस्करण लोकप्रिय हुआ उसकी चाल धीमी  तथा उदासी लिए हुए है पर इस बंदिश में उत्साह भी है और गति भी। इस संस्करण का आगाज़ स्वरमंडल की आल्हाददायक ध्वनि तरंगों से होता है। जबकि मन्ना डे के गाये गीत का आरंभ सारंगी की विकल धुन से है। दोनों रचनाओं में अलग अलग वाद्यों का प्रयोग हुआ है।
यहां कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं जैसे – इस गीत का मूड अलग था तो अंतरे क्यों नहीं रखे गये? इस जुगलबंदी को उचित विस्तार क्यों नहीं दिया गया? यदि ऐसा होता तो यह गीत केतकी गुलाब जूही या आज गावत मन मेरो झूम जैसी अमर शास्त्रीय बंदिश बन जाता।
पटियाला में जन्मे शिवदयाल बातिश पंडित अमरनाथ, हुस्नलाल और भगतराम के चचेरे भाई थे। उनपर बचपन में ही शास्त्रीय संगीत के संस्कार हुए। वे गायन के साथ सितार और विचित्र वीणा वादन में भी सिद्धहस्त थे। आकाशवाणी से जुड़ने के बाद उन्होंने फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। बीस से अधिक चित्रपटों में मधुर संगीत दिया। शिवदयाल बातिश के शास्त्रीय स्वर का प्रयोग ग़ुलाम हैदर और अनिल विश्वास से लेकर मदन मोहन और जयदेव तक ने किया है। साठ के दशक में उन्होंने इंग्लैंड जाकर बीबीसी में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने जीवन के अंतिम पड़ाव पर केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भारतीय शास्त्रीय संगीत के अध्यापन का जिम्मा संभाला। वहीं उनका निधन हो गया।
शिवदयाल बातिश को गायन प्रतिभा दिखाने के बहुत ज़्यादा अवसर नहीं मिले। ना तो कारवां की तलाश है, मनमोहन मन में हो तुम्हीं आदि गीतों में अन्य स्थापित गायक कलाकारों के साथ उनके स्वर की खनक तो सुनाई दी पर उनकी अलग पहचान नहीं बनी। अंततः अपने देश में उपेक्षित इस हुनरमंद फ़नकार ने विदेशों में भारतीय शास्त्रीय संगीत का अलख जगाया।
सुरसम्राट मन्नाडे को जब ऐ भाई ज़रा देख के चलो के लिए फिल्मफेयर मिला तब उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करने की बजाय आक्रोश व्यक्त किया था कि यह पुरस्कार उन्हें पूछो ना कैसे मैंने या लागा चुनरी में दाग के लिए मिलना था। इस फ़िल्म का युगल गीत तेरे बिन सूने नैन हमारे भी मन्ना डे ही गाना चाहते थे। उन्होंने सचिन देव बर्मन से बहुत ज़िद की पर वे नहीं माने। सचिन देव बर्मन जो ठान लेते थे वही करते थे। उन्होंने यह गीत लता के साथ रफ़ी से गवाया।
सचिनदेव बर्मन संगीत की गुणवत्ता को लेकर कोई समझौता नहीं करते थे। उन्होंने नाचे मन मोरा मगन में तबले के महत्व को देखते हुए तबला नवाज़ पं. सामता प्रसाद को मुंहमांगी बिदागी देकर आमंत्रित किया था। तय दिन पं. सामता प्रसाद के स्टूडियो नहीं पहुंचने पर सचिनदेव बर्मन ने इस गीत की रिकॉर्डिंग मुल्तवी कर दी थी। पूछो ना कैसे मैंने रैन बितायी की रिकॉर्डिंग से खुश होकर वे छोटे बच्चे की तरह नाचे थे।
मेरी सूरत तेरी आंखें एक कुरूप युवक की करुण कहानी है जिसे जन्म लेते ही त्याग दिया गया। यह बालक प्यारे (अशोक कुमार) एक अमीर व्यापारी  राजकुमार (ईश्वर लाल) के घर पैदा होता है। परंतु इसके बदसूरत होने से पिता इसे नकार देता है। वह पत्नी कमला (अचला सचदेव) से झूठ बोलता है कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। डॉ.माथुर (तरुण बोस) इस बालक को संतान विहीन रहमत (कन्हैयालाल) को सौंप देता है। मरते समय रहमत प्यारे को बता देता है कि वह हिंदू का बेटा है। डॉ. माथुर के ज़रिए प्यारे अपने पिता के घर पहुंच जाता है पर वह अपना राज़ अपनी मां से छिपाकर रखता है। राजकुमार के छोटे बेटे सुधीर (प्रदीप कुमार) और डॉ.माथुर की बेटी कविता (आशा पारेख) की शादी होने वाली है। सुधीर की होटल का मैनेजर प्रकाश (इफ्तेखार) और बेला (इंदिरा) उससे रुपये ऐंठने की चाल चलते हैं वे सुधीर का अपहरण कर चार लाख की फिरौती मांगते हैं। डॉ.माथुर से कमला को प्यारे की सच्चाई पता चल जाती है। प्यारे सुधीर को मुक्त करा लेता है पर वह प्रकाश की गोली लगने से घायल हो जाता है। अंत में मां की गोद में उसकी मृत्यु हो जाती है।
चित्रपट में इस गीत का प्रसंग यह है कि गायक रहमत अपने किशोर वयीन बेटे प्यारे को राग अहिर भैरव की रियाज़ करा रहा है। इसी दौरान वह बूढ़ा और बेटा जवान हो जाता है। रहमत के लिए शिव दयाल बातिश के स्वर का प्रयोग किया गया है। बालक प्यारे के लिए रानू मुखर्जी और युवा प्यारे के लिए मन्ना डे की आवाज़ उधार ली गई।
प्यारे की परवरिश करते हुए रहमत इस बात का ध्यान रखता है कि वह हिंदू दंपति की संतान है। वह प्यारे पर हिंदू धर्म के संस्कार करता है। वक्त आने पर उसे यह सच्चाई भी बता देता है। इसी साम्प्रदायिक सद्भावना के तहत आलोच्य गीत के दृश्यांकन में दोनों धर्मों के उपासना स्थल दिखाये गये हैं। इस गीत के अलावा कन्हैयालाल पर चित्रित एक ही गीत याद आता है – यशोमति मैया से बोले नंदलाला। आम चित्रपटों में लंपट,काईयां और आग लगाऊ भूमिका करने वाले कन्हैयालाल इस फ़िल्म में भले मानुस नज़र आये। जबकि अक्सर इंस्पेक्टर का किरदार निभाने वाले इफ्तिखार ने खल पात्र का अभिनय किया। मन्ना डे के एक सोज़ भरे आलाप से गीत आरंभ होता है। साथ में तबले की मद्धम मद्धम थाप और बांसुरी की विकल तान। सचिन देव बर्मन ने कोमल धुन में गीत के उदास मूड को अक्षुण्ण रखा है। मन्ना डे ने इस गीत में इतनी आत्मीयता से सुरवर्षा की है कि यह बंदिश उनके प्रतिनिधि गीत के रूप में कालजयी हो गयी। उन्होंने प्यारे की जीवन के प्रति विरक्ति सुरों में ढालकर अभिव्यक्त की है। अशोककुमार ने विद्रूप चेहरे वाले नायिकाविहिन प्यारे की चुनौतीपूर्ण भूमिका में जीवंत अभिनय से प्राण फूंक दिये हैं। शैलेंद्र ने इस रचना में एक बदसूरत व्यक्ति की तड़प को बखूबी पेश किया है। जिस शास्त्रीय संस्करण की चर्चा की जा रही है,उसमें अंतरे नहीं हैं अतः मन्ना डे द्वारा गाये संस्करण की गाथा प्रस्तुत है। यह गीत पर्दे पर एक नाज़ुक मोड पर आता है। रहमत मृत्युशैया पर है और प्यारे उसकी प्रिय बंदिश गाकर उसे चैतन्य रखने का प्रयास कर रहा है। गीत समाप्त होते ही रहमत के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।
एक लंबी काली रात के बाद क्षितिज पर दस्तक देती भोर। सुबह जो अंधकार दूर करती है। प्रकाश की किरण लेकर आती है। लेकिन प्यारे के लिए यह रैन बहुत मनहूस है। वह पिता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है। उजाले की किरण से कोई आशा नज़र नहीं आ रही। उसके लिये एक एक क्षण एक एक युग की तरह लम्बा और भारी रहा है।
एक तरफ दीप जल रहा है और दूसरी ओर प्यारे का मन। उसके मन से अंधकार का साम्राज्य खत्म ही नहीं हो रहा। यह कुरूप चेहरा लेकर वह कहां जाये? वह उम्रभर तड़पता तरसता रहा है। यह स्याह रात भी इसी चिंता में काटी है कि क्या पता सुबह क्या हो? प्यारे के जीवन में न कोई चंद्रमा है और न ही सितारे। उसका सम्पूर्ण जीवन सिर्फ़ अमावस है। उसकी आंखें प्रकाश के लिए तरस रही हैं। सुबह की किरण भी उसके जीवन का अंधकार दूर नहीं करती।
पूछो ना कैसे मैंने रैन बितायी – 2
इक पल जैसे इक जुग बीता -2
जुग बीते मोहे नींद न आयी
पूछो ना कैसे…. उत जले दीपक इत मन मेरा
फिर भी न जाये मेरे घर का अंधेरा II1II
उत जले दीपक इत मन मेरा
मन मेरा,मेरा
उत जले दीपक इत मन मेरा
फिर भी न जाये मेरे घर का अंधेरा तरपत तरसत उमर गंवायी पूछो ना कैसे… ना कहीं चंदा ना कहीं तारे ज्योत के प्यासे मेरे नैन बेचारे II2II ‌ भोर भी आस की किरण न लायी पूछो ना कैसे… सृष्टि निर्माता ने हर इंसान को अलग बनाया है। हर किसी को कोई न कोई हुनर दिया है। बाह्य सौंदर्य बाह्य तो दिखावटी होता है। असली सौंदर्य तो आंतरिक है। उसे देखने के लिए वैसी दृष्टि भी होना चाहिए। एक मां की नज़र में उसका बेटा सुंदर ही होता है भले ही उसकी शक्ल अच्छी न हो। व्यक्ति का आकलन चेहरे से नहीं,उसमें निहित प्रतिभा से होता है। अंतःकरण सुंदर हो तो व्यक्ति भी सुंदर ही होगा।

श्रीधर कामत

9826824680

भाग – 55 शाख से टूट के गिरने की सज़ा दो मुझको

भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे लोकप्रिय गायन विधाओं में ग़ज़ल की अपनी अहमियत है। खासकर भारत और पाकिस्तान के ग़ज़ल गायकों ने इसे परवान चढ़ाकर दुनिया भर में मशहूर किया। ग़ज़ल के शौकीनों का एक अलग ही वर्ग है जिसे ग़ज़ल के आगे संगीत की अन्य सारी विधाएं फीकी लगती हैं। कुछ दर्दी श्रोता तो सिर्फ़ गैर फ़िल्मी ग़ज़ल ही सुनना पसंद करते हैं।
गीत गाथा की इस खास पेशकश में यादें एक खास गैर फ़िल्मी पुरानी ग़ज़ल की। सत्तर के दशक की कुंदन सी दमकती और चंदन सी महकती यह ग़ज़ल है – शाख से टूट के गिरने की सज़ा दो मुझको। इसे अपनी नायाब आवाज़ से बक्शा है जनाब राजकुमार रिज़वी ने। इसके शायर हैं अहमद वसी और इसे स्वरबद्ध किया मुरली मनोहर स्वरूप ने। सिर्फ़ चार पांच साज़ों (हारमोनियम, सारंगी, संतूर और तबला) से सजी यह लाफ़ानी ग़ज़ल सुनकार की तबीयत खुश कर देती है। बहुत अरसे से अनसुनी होने और शास्त्रीयता की मिठास के कारण इसमें एक ताज़ा खुशबू,एक अलग एहसास है।

अहमद वसी सिर्फ़ बतौर शायर और गीतकार जाने जाते हैं,पर उनका रेडियो से भी नाता रहा है। वे विविध भारती से अनेक वर्षों तक जुड़े रहे। आलोच्य ग़ज़ल उनकी पहली रचना थी।उनके
कुछ प्रसिद्ध गीत हैं – मेरे शरीक-ए-सफ़र अब तेरा खुदा हाफ़िज़, आ के दरद जवां है, होठ है तेरे दो लाल हीरे और बेहद सुरीला गीत शाम रंगीन हुई है तेरे आंचल की तरह। अहमद वसी संगीतकार ओ.पी.नैयर के अंतिम दिनों में उनके काफ़ी करीब रहे।
राजकुमार रिज़वी उस दौर के वरिष्ठ ग़ज़ल गायक हैं जब भारत में गैर फ़िल्मी ग़ज़ल की कोपलें पूरी तरह फूटी भी नहीं थीं। आम रसिक के लिए ग़ज़ल फ़िल्मों तक सीमित थी। वह भी मदन मोहन और तलत महमूद के कारण। ज़्यादातर ग़ज़लें लोकप्रिय फ़िल्म गायक ही गाते थे। सत्तर के दशक में ग़ज़ल गायकी के परिदृश्य पर ग़ुलाम अली और फिर जगजीत सिंह के उभरने के साथ ही सारी पुरानी इबारतें धुंधली हो गईं और एक नया इतिहास लिखा गया। खुद राजकुमार रिज़वी ने स्वीकार किया कि जगजीत सिंह के इंतकाल के बाद ग़ज़लों की महफिलें सूनी हो गईं।
गायक राजकुमार रिज़वी का जन्म झुंझुनूं जिले के मंडावा में एक संगीत प्रेमी कलाकार घराने में हुआ। संगीत की प्रारम्भिक तालीम उन्होंने अपने पिता उस्ताद नूर मोहम्मद से ली जिनका ताल्लुक कलावंत घराने से था। कम उम्र में ही राजकुमार पिता के साथ दरबार में गाने लगे। सोलह वर्ष की उम्र में उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री के सामने गाना गाया औप खूब वाहवाही लूटी। गाने के साथ-साथ राजकुमार को सितार भी बहुत पसंद आया और वे पंडित रविशंकर के शागिर्द उस्ताद जमालुद्दीन भारती से सितार भी सीखने लगे। धीरे-धीरे राजकुमार रिज़वी आकाशवाणी पर सितार बजाने लगे। वक्त बीतते सितार तो राजकुमार रिज़वी का मात्र शौक रह गया और वे अपने चाचा मेहदी हसन की तर्ज़ पर गजल गायकी में पूरी रुचि लेने लगे। शास्त्रीय संगीत की तालीम होने से उनकी गायी‌ ग़ज़लों की चर्चा होने लगी और उन्हें शोहरत मिली।
ग़ज़लों के कार्यक्रम के सिलसिले में रूस यात्रा के दौरान राजकुमार रिज़वी की मुलाकात मशहूर गायिका इंद्राणी मुखर्जी से हुई। जल्द ही दोनों ने शादी कर ली और साथ गाना शुरू कर दिया। राजकुमार रिज़वी ने फ़िल्म लैला- मजनू में शीर्षक गीत लैला मजनू दो बदन एक जान थे (अनुराधा पौडवाल,प्रीति सागर के साथ/जयदेव*/साहिर) भी गाया। उन्होंने कई राजस्थानी फ़िल्मों में गाया और संगीत भी दिया। उन्होंने बिरजू महाराज (कथक) तथा केलुचरण महापात्र (ओडिसी) के लिए कुछ नृत्य धुनें भी तैयार कीं। राजकुमार रिज़वी ने अपने आराध्य मेहदी हसन के साथ मुम्बई, सूरत, अहमदाबाद, कराची एवं कनाड़ा में कईं महफिलें सजाईं। राजकुमार रिज़वी मेहंदी हसन के प्रथम शिष्य थे। यही वजह है कि इनकी गायिकी में अपने उस्ताद का असर स्पष्ट दिखता है। मेहदी हसन के बारे में उन्होने एक साक्षात्कार में कहा था कि मुझे मेहदी हसन के शास्त्रीय रागों से अनुराग और लिखे हुए अल्फाज़ों के प्रति उनकी संवेदनशीलता ने खासा प्रभावित किया। शास्त्रीय रागों का चयन ग़ज़ल की रूमानियत के मुताबिक करना राजकुमार रिज़वी की खासियत थी। इसी तरह जब ग़ज़ल के अशआर गंभीरता का पुट लिए होते वो उसके लिए उसी किस्म का रूहानी संगीत तैयार करते थे।
राजकुमार रिज़वी भले ही मेहदी हसन के शिष्य माने जाते हों और उनके गायन पर मेहदी हसन का प्रभाव दिखाई देता हो, लेकिन उन्होने कभी भी अपने उस्ताद की शैली की नकल करना पसंद नहीं किया। उनके गायन में ज्यादा उतार चढाव या मुरकियों और सरगमों की लम्बी ताने नहीं दिखाई देती है। वे अन्य ख्यातिप्राप्त गायकों की तरह ज्यादा लटके झटके भी नहीं दिखाते थे। उनका गायन सीधा होने के साथ साथ सीधे दिल में उतर जाने की कुव्वत रखता था।
बतौर गायक राजकुमार रिज़वी ने ग़ज़ल को शास्त्रीय संस्कार प्रदान किये। उनकी रचनाओं में परंपरा और शास्त्रीयता का सुरीला मिश्रण है। उन्हें सुनकर ऐसा लगता है कि कोई शास्त्रीय गायक ग़ज़ल गा रहा है। राजस्थानी पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें मांड और मरुभूमि के लोकसंगीत में भी महारत हासिल थी। अपनी तरल आवाज़ और रागदारी के कारण राजकुमार रिज़वी ने दुनिया भर में शोहरत हासिल की।
इसी ग़ज़ल को राजकुमार रिज़वी की पुत्री नेहा रिज़वी ने भी गाया है। लेकिन इसमें मुरकियां और लटके झटके ज़्यादा हैं जो नव गायन और परिपक्वता के अंतर को सुस्थापित करता है। एक बात तो तय है कि अगर मेहदी हसन ग़ज़ल गायकी के बादशाह थे तो राजकुमार रिज़वी इस विधा के शहज़ादे थे।
गीत गाथा में उनकी जिस ग़ज़ल की चर्चा की जा रही है,उसे पूरी तरह से ग़ज़ल कहना भी उचित नहीं होगा । शास्त्रीय संगीत पर आधारित रचना शाख से टूट के गिरने की सज़ा दो मुझको एक तरह से अपने प्रियजन से शिकवा करने के साथ-साथ अरज करने की एक अनोखी अदा है। मानो कोई प्रेमी अपनी प्रियतमा से गुहार कर रहा है कि मुझे शाख से गिरने की सज़ा दो । इस सज़ा में भी उसे एक तोहफ़ा नज़र आता है । क्योंकि पत्ता शाख से गिरकर सीधे दरख्त के कदमों को चूमने का मौका पा जाता है। आमतौर पर कोई भी पत्ता शाख से तभी गिरता है जब वह पक जाता है यानि कि पूर्णता की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। प्रेम में पूर्णता के बाद समर्पण की स्थिति आती है और शाख से गिरकर दरख्त के कदमों में जगह पाना प्रेम की पूर्णता का प्रतीक है। जैसा कि ग़ज़ल में जिक्र किया गया है कि एक पत्ता ही तो हूं,क्यों न हवा दो मुझको। यह उस पत्ते का एक विनम्र निवेदन है जो चारों मौसम के नरम गरम सर्द और सख्त हवाओं के निर्मम थपेडों को सहते हुए पूरी तरह परिपक्व हो चुका है, लेकिन दरख्त से जुड़े मोह के चलते वह जर्जर और जीर्ण शीर्ण होने के बावजूद उससे चिपका हुआ है। उसकी फखत इतनी फरियाद है कि कहीं से हवा का एक झोंका आकर उसे शाख की ऊंचाइयों से उतार कर दरख़्त की जडों से जोड़ दे। एक महबूब जो अपनी महबूबा की पेशानी चूम कर प्रेम की पराकाष्ठा प्राप्त कर चुका है, उसकी भी चरम कामना यही होती है कि वह महबूबा का कदम बोसा लेकर प्रेम को पूर्णता प्रदान करे क्योंकि उसके कदमों के नीचे ही तो जन्नत होती है। पत्ते और प्रेमी की तरह ही प्रभु के प्यारे जो अपनी साधना से भक्ति का शिखर छू चुके हैं उनकी भी यही परम कामना होती है कि शीतल हवा के झोंके की मानिंद ईश्वर के स्नेहिल स्पर्श से उन्हें शिखर से उतार कर अपने चरणों में परमधाम देकर ठीक उसी तरह मोक्ष प्रदान करे, जिस तरह प्रभु का आशीर्वाद पा कर मस्तक पर चढा पुष्प चरणों पर गिरकर धन्य हो जाता है।

मुखड़े और पहले अंतरे में यमक अलंकार (सज़ा और सजा) का बेहतरीन उपयोग किया गया है । एक सज़ा तो वह होती है जो किसी गुनाह के लिए दी जाती है और सजा का दूसरा अर्थ अलंकृत होना है। जब यह सवाल किया जाता है कि यदि वह शीशा है तो तस्वीर के साथ सजा दिया जाए और यदि वह पत्थर है तो उसे रास्ते से हटाने की सज़ा दी जाए। आमतौर पर प्रेमी और प्रियतम के बीच शीशे और तस्वीर का ही रिश्ता होता है क्योंकि इस शीशे में वह किसी भी पल यह कहते हुए प्रियतम की शक्ल देख सकता है कि शीशा-ए-दिल में छिपा है ऐ सितमगर तेरा प्यार , जब ज़रा गरदन झुकाई देखली तस्वीर-ए-यार।

प्रीतम ने अपने दिल में अपनी प्रेयसी को सर्वोच्च,अटल स्थान दिया है। भले ही मेहबूबा उसे पेड़ के पत्ते की तरह निगाहों से गिरा दे,उसकी नज़रों में माशुका की तस्वीर वैसी ही बनी रहेगी। यही प्यार का फ़लसफ़ा है। शायर ने इन दो पंक्तियों में गंभीर बात को कितनी सहजता से व्यक्त किया है।
अंजाम तक आते आते फ़नकार अपने हालात का इज़हार करते हुए कहता है कि वह जिस हाल में है खुश है क्योंकि शाख से टूटकर दरख्त के कदमों मे जान निसार कर देना किसी ज़िंदगी से कम नही है । इसमें मौत या फ़ना होने का अहसास नहीं, बल्कि अपने प्रियतम के कदमों में जीने का अहसास होता है। भले ही यह भरम हो, लेकिन प्यार में फ़ना हो जाने वाला इस भरम को टूटने नहीं देना चाहता है । इसीलिए वह दरखास्त करता है कि उसे जीने की दुआ इसलिए भी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि एक पत्ते के रूप में ज़िंदा रहकर उसे अपने प्रियतम की पहुंच से दूर रहना होगा। इस विरह से तो अपने अस्तित्व को उसमें विलिन कर देने की सज़ा ज़िंदगी से बेहतर है। यह प्रेमी के समर्पण की भावना है।
आम श्रोताओं को भले ही इस ग़ज़ल में एक प्रेमी की अभिलाषा दिखाई देती हो, लेकिन मेहदी हसन के इस शिष्य की बात इतनी आसान नहीं है जितनी कि सरसरी तौर पर सुनाई देती है। यदि इसके बोलों में ‘टूट’ तथा ‘गिरने’ और हर पंक्तियों के बाद ‘मुझको‘ शब्द पर जिस तरह से बलाघात किया गया है वह इसे दूसरा ही अर्थ प्रदान करता है। यह रूमानी ग़ज़ल से एक सूफियाना बंदिश की शक्ल अख्तियार कर लेती है । हिन्दू धर्म में इसे भक्ति के दास भाव के रूप में निरूपित किया गया है। इस परम्परा को रैदास जैसे भक्त ने आगे बढाया था । रैदास अपने आपको ईश्वर का दास मानते थे और अपने ईश्वर को अपने से श्रेष्ठ या ऊंचा मुकाम देते हुए कहते थे – प्रभु तुम चंदन मैं पानी । इसमें भगवान और भक्त की चंदन -पानी,
घनवन-मोर , चंद्र-चकोर, दीपक -बाती , मोती -धागा और सोना तथा सुहागा के रूप में तुलना की गई है, जिसका उपसंहार प्रभु तुम स्वामी हम दासा है। राजकुमार रिज़वी की यह ग़ज़ल भी कुछ ऐसा ही संदेश देती है।
आध्यात्मिक रूप से यदि इसके मायने निकाले जाएं तो वृक्ष भगवान है और उसकी शाखाएं दुनिया। भक्त उसकी किसी शाखा पर चिपका हुआ एक पत्ता है। उसकी आरज़ू भी यही है कि भगवान तेज़ हवा की आंधी में उसे उडाकर भक्तिभाव से दूर न करे बल्कि पत्ते की तरह पक जाने पर (जीवन के पूर्णत्व) दुनिया की शाख से टूटने का आशीर्वाद देकर अपने चरणों में बस जाने की नियति प्रदान करे। वह यह भी कहता है कि यदि उसकी भक्ति शीशे की तरह पारदर्शी है तो उसे अपने हृदय रूपी तस्वीर में फ्रेम बनाकर कैद करले। और यदि वह समझता है कि उसकी भक्ति में कहीं कोई खोट है और वह भक्ति की राह का रोडा है तो उसे अपनी राह से हटा दे । उसकी गुजारिश है कि अब तक उसने ईश्वर को पाने के जितने भी प्रयास किये हैं उनसे उसकी भक्ति एक न एक दिन उसे अपने परमपिता के चरणों में जगह दिला देगी। अगर यह उसका भ्रम है तो इसे टूटने न दिया जाये और इस मिथ्यापूर्ण जीवन में जीने की दुआ न देते हुए उसे अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान कर अपने में समाविष्ट कर लिया जाए।
शाख़ से टूट के गिरने की सज़ा दो मुझको
एक पत्ता ही तो हूं क्यों न हवा दो मुझको
शाख़ से टूट के…
मैं हूं शीशा तो सजा दो किसी तस्वीर के साथ -2II1II
और पत्थर हूं तो रस्ते से हटा दो मुझको -2
एक पत्ता ही तो….
मैं तुम्हें अपनी निगाहों से न गिरने दूंगा -2 II2II
तुम जो चाहो -2
तुम जो चाहो तो निगाहों से गिरा दो मुझको
एक पत्ता ही तो….
अपने अंदाज़ से जीने का भरम क्यों टूटे -2II3II
दोस्तों आज न जीने की दुआ दो मुझको
एक पत्ता ही तो….

इस ग़ज़ल में प्रेम और भक्ति का सुंदर सामंजस्य है। प्रेम ही भक्ति और भक्ति ही प्रेम है। यह ग़ज़ल समर्पण की निश्च्छल भावना प्रदर्शित करती है । यह जीवन नश्वर है अतः उससे अत्यधिक मोह माया मिथ्या है, स्वयं से छलावा है। ज़िंदगी से मोहभंग ही दुःख और संताप का कारण बनता है। आयुष्य एक वृक्ष है और उम्र उसपर उगा हुआ पत्ता। एक न एक दिन हरे पत्ते को पीला होकर पेड़ से झरना ही है। समय रूपी पतझड़ से बचने का प्रपंच व्यर्थ है। यदि मनुष्य इस नियति को समझकर स्वीकार कर ले तो शाख से टूटकर उसके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

अशोक जोशी

9424594851

संपादन- श्रीधर कामत

*लैला मजनू (1975)के संगीतकार मदन मोहन थे,जिनका फ़िल्म का संगीत पूर्ण होने से पहले निधन हो गया। शेष संगीत जयदेव ने दिया था।

भाग – 54 कोई दूर से आवाज़ दे,चले आओ…

आमतौर पर रहस्य कथाओं पर आधारित फ़िल्मों में कोई न कोई गूढ़ गीत होता है। यह नग़्मा दर्शक या श्रोता की जिज्ञासा बढ़ाकर उसे कहानी से बांधकर रखता है। पर कभी कभी किसी रहस्य रहित फ़िल्म में भी ऐसा गाना जगह बना लेता है जो अपनी सोज़भरी गायिकी और गहन गंभीर धुन के कारण सुनकार की आतुरता बढ़ा देता है। ऐसे गीत (हॉन्टिंग सॉन्ग) मन की कंदराओं में प्रवेश कर उसे व्यथित कर देते हैं।
गीत गाथा का यह सुमन एक ऐसे ही गीत की यादों के उजाले लेकर आया है। यह गीत है – कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ (साहब,बीबी और ग़ुलाम/गीता दत्त/हेमंत कुमार/शकील बदायूंनी)। इस गीत की गायिकी में जहां विरह की पीड़ा है,मिलन की व्याकुलता है वहीं इसका अनूठा संगीत हमें स्तब्ध कर देता है। मानो यह तराना हमें पुकार कर अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।
यह गुरुदत्त फ़िल्म्स के बैनर तले निर्मित और गुरु दत्त द्वारा अभिनित अंतिम फ़िल्म थी। इसे चार फ़िल्म फेयर पुरस्कारों से नवाज़ा गया –
सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म (गुरु दत्त), सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (मीना कुमारी),सर्वश्रेष्ठ निर्देशन (अबरार अल्वी) और सर्वश्रेष्ठ छायांकन (वी.के.मूर्ति)।
इस चित्रपट में अन्य छः गीत थे जिनमें दो मुजरे थे – मेरी जां अच्छा नहीं इतना सितम और साक़िया आज मुझे नींद नहीं आएगी (आशा भोसले)। दो गीत वहीदा पर फ़िल्माए गये -भंवरा बड़ा नादान हाए और मेरी बात रही मेरे मन में (आशा)। तथा दो गाने मीना कुमारी पर चित्रित थे -पिया ऐसो जिया में समाए गयो रे एवं न जाओ सैयां छुड़ा के बैयां (गीता दत्त)। एक गीत हेमंत कुमार के स्वर में भी था – साहिल की तरफ़ कश्ती ले चल पर फ़िल्म के कथानक में पुरुष स्वर में गीत की गुंजाईश नहीं होने के कारण इसे फ़िल्माया नहीं गया। इसी धुन पर कुछ साल बाद हेमंत कुमार ने या दिल की सुनो दुनिया वालों (अनुपमा/हेमंत कुमार/कैफ़ी आज़मी) का सृजन किया।
गुरु दत्त को कागज़ के फूल से बहुत उम्मीदें थीं। पर इस फ़िल्म के असफल हो जाने से वे निराश हो चुके थे। उन्होंने तय कर लिया था कि वे अब किसी फ़िल्म का निर्देशन नहीं करेंगे। साहब बीबी और गुलाम के दिग्दर्शन के लिए पहले सत्येन बोस से बात की गई। उनकी ओर से इंकार करने पर यह प्रस्ताव नितिन बोस के समक्ष रखा गया। जब उन्होंने भी असमर्थता व्यक्त की तब गुरु दत्त ने यह ज़िम्मेदारी अपने निकटस्थ सहयोगी अबरार अल्वी को सौंपी।
गुरु दत्त इस चित्रपट के नायक का किरदार भी अदा नहीं करना चाहते थे। उन्होंने इस भूमिका के लिए शशि कपूर से संपर्क किया था। उन दिनों युवा शशि कपूर इतने व्यस्त थे कि राज कपूर उन्हें टैक्सी कहते थे। शशि कपूर के मना करने पर गुरु दत्त को भूतनाथ का चरित्र निभाना पड़ा। वहीदा रहमान को भी छोटी बहू का चरित्र पसंद था। परंतु गुरु दत्त का सोचना था कि छोटी बहू एक मध्यमवयीन स्त्री है। वहीदा उस समय युवा थीं अतः उनकी छवि उस किरदार के साथ न्याय नहीं कर सकती थी। इसलिए उन्हें जबा की सहायक भूमिका दी गई। वहीदा ने अबरार अल्वी से अनुरोध कर अपनी भूमिका को विस्तार दिलवाया।
साहित्यिक कृतियों पर निर्मित सर्वश्रेष्ठ चित्रपटों में शुमार फ़िल्म साहब बीबी और गुलाम प्रसिद्ध साहित्यकार बिमल मित्र के बांग्ला उपन्यास पर आधारित थी। इसमें उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजों के शासनकाल में सामंतवाद और ज़मींदारी के पतन का चित्रण किया गया है। साथ ही एक कुलीन मगर अय्याश ज़मींदार (साहब) की पतिव्रता पत्नी (बीबी) के एक मुलाज़िम (गुलाम) के साथ आदर्श और पवित्र मैत्रीपूर्ण संबंध दर्शाये गये हैं। इसपर एक बांग्ला फ़िल्म भी बनी। बिमल मित्र का मूल बांग्ला उपन्यास कोलकाता के आधुनिकीकरण और विस्तार का आख्यान है। इसमें सनातनी मान्यताओं और ब्रह्म समाज के उदय पर भी प्रकाश डाला गया है। एक सामंतवादी परिवार का वक्त की नब्ज़ को न पहचानते हुए आमोद प्रमोद में लिप्त रहना। एक विलास और वैभव की प्रतीक हवेली में असीम सुखों की छांव में भी अनगिनत दुःखों की तपिश सहते चरित्र। कथा के सूत्रधार भूतनाथ द्वारा वर्तमान का संवाहक होकर भी अतीत में विचरण। इन विशेषताओं से प्रभावित गुरु दत्त इस उपन्यास की ओर आकर्षित हुए।
इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने का निर्णय लेने के बाद गुरु दत्त ने बिमल मित्र को मुंबई बुलवाया। उनसे सात सौ पृष्ठ के कथानक पर बांग्ला में ढाई घंटे की पटकथा लिखवाई। अबरार अल्वी ने इसका हिंदी अनुवाद और फ़िल्मीकरण किया। फ़िल्म के गंभीर विषय के कारण इसके असफल होने का खतरा था पर गुरु दत्त ने उपन्यास की मूल भावना के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की।
नतीजा यह रहा कि यह चित्रपट कामयाब रहा।
बिमल मित्र को गुरु दत्त के लोनावला स्थित बंगले में फ़िल्म की पटकथा लिखने के दौरान इस अबूझ पहेली जैसे व्यक्तित्व को करीब से देखने का मौका मिला। दोनों के बीच संभाषण से गहरी मैत्री हुई। बिमल मित्र ने गुरु दत्त के भीतर की बेचैनी, भावी योजनाओं को लेकर सोच, दाम्पत्य जीवन के तनाव और अकेलेपन को नजदीक से महसूस किया। उन्होंने दत्त दंपति के विवाद को सुलझाने की भी पहल की। बिमल मित्र ने मान्य किया कि उन्होंने लेखक को आज़ादी और सम्मान देने वाला और अपनी कलाकृतियों के प्रति समर्पित गुरु दत्त के अलावा कोई फ़िल्मकार नहीं देखा। उन्होंने बाद में गुरु दत्त के जीवन पर एक पुस्तक बिछड़े सभी बारी बारी भी लिखी।
चित्रपट का आरंभ एक हवेली के खंडहर से होता है। इस जगह नई इमारत बनने वाली है। वास्तुविद अतुल्य चक्रवर्ती (गुरु दत्त) उन भग्नावशेषों को देखकर दंग रह जाता है। यह तो ज़मींदार चौधरी परिवार की हवेली थी। वह पुरानी यादों में खो जाता है जब वह युवावस्था में रोज़गार की तलाश में कोलकाता आया था। क्या जलवे और शान थी इस हवेली की। नौकर चाकर,बग्गियां,फव्वारे, झूमर,नाच गाना। मंझले बाबू (सप्रू) की वो अंगारे जैसी नज़र। छोटे बाबू (रहमान) की रात भर तवायफ़ के कोठे पर अय्याशी। पति प्रेम को तरसती छोटी बहू (मीना कुमारी)। इस आलीशान हवेली में रहकर भूतनाथ (गुरु दत्त का दूसरा नाम) मोहिनी सिंदूर का उत्पादन करने वाली कंपनी में नौकरी करता है। इस सिंदूर का दावा है कि इसे लगाने वाली स्त्री अपने पति को वश में रख सकती है। छोटी बहू भूतनाथ से यह सिंदूर मंगाती है,पर उसका कोई असर नहीं होता। कंपनी के मालिक की बेटी जबा (वहीदा रहमान) भूतनाथ के भोलेपन पर मर मिटती है। पर उसे भूतनाथ का छोटी बहू से मेलजोल पसंद नहीं। भूतनाथ को एक निर्माण कंपनी में वास्तुकार की नौकरी मिल जाती है। छोटे बाबू के कहने पर छोटी बहू शराब पीने लगती है। एक दिन चौधरी खानदान का शत्रु छोटे बाबू पर हमला कर देता है जिससे वह अपंग हो जाता है। पति के ईलाज के लिए भूतनाथ के साथ जा रही छोटी बहू पर मंझले बाबू के गुंडे हमला कर देते हैं। छोटी बहू गायब हो जाती है।चौधरी खानदान का दिवालिया हो जाता है। फ्लैश बैक खत्म होता है। खंडहरों के बीच एक कब्र में से एक कंकाल निकलता है जिसके हाथ में एक सोने का कड़ा है। अतुल्य के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह छोटी बहू का कंकाल है। वह भारी मन से बाहर आकर अपनी पत्नी जबा के साथ वहां से प्रस्थान करता है। यही फ़िल्म का अंत है।
इस फ़िल्म की केंद्रीय पात्र छोटी बहू,पत्नी का अधिकार प्राप्त करने के लिए,आत्मसम्मान की खातिर अपना जीवन दांव पर लगा देती है। वह सतत संघर्ष करती है। अपना भविष्य संवारने की ज़िम्मेदारी अपने हाथों में लेती है। समाज द्वारा निर्धारित लक्ष्मणरेखा उलांघ कर पर पुरुष की मदद से अपने पति को प्राप्त करने की कोशिश करती है। इस प्रयास में वह घर नहीं छोड़ती। हार मानकर आत्महत्या का प्रयास भी नहीं करती। बल्कि मौत का सामना करने के लिए भी तैयार रहती है।
फ़िल्म आरंभ होने के पचास मिनिट बाद छोटी बहू पर्दे पर प्रकट होती है। भव्य कपाल। उसपर बड़ी सी कुमकुम की बिंदिया। भावप्रवण नयन जिनमें करुणा और स्नेह है। कंपकपाते होंठ। मातृत्व के लिए लालायित,गंभीर और संवेदनशील छोटी बहू का वह तेजोमय स्वरुप देखकर भूतनाथ अभिभूत हो जाता है। अनेक अलंकारों में सजी, महंगी साड़ी परिधान किए हुए खानदानी तेजस्वी सौंदर्य से प्रकाशित छोटी बहू के प्रति भोले भूतनाथ के मन में आदरयुक्त भय की भावना घर कर लेती है। छः मिनिट के उस प्रसंग में दर्शक मीना कुमारी के अनेक रूप देखकर मुग्ध हो जाता है।
बाज़ारी औरतों के साथ अय्याशी में डूबे पति का स्थान छोटी बहू के मन में भगवान के स्थान की तरह ही पवित्र है। वह गरीब घर की बेटी है, अशिक्षित है पर पति परमेश्वर के दिल में जगह पाने के लिए उसकी जद्दोजहद जारी रहती है। हमेशा झिड़कने वाले पति के स्वागत में खुद को सजाते हुए वह उन्मुक्त होकर गाती है –मैंने सिंदूर से मांग अपनी भरी ,रूप सैयां के कारण सजाया।

इस डर से किसी की नज़र न लगे,झट नैनन में कजरा लगाए बैठी।

कोठे पर जा रहे पति को रोकते हुए वह रुंधे गले से निवेदन भी करती है –
जो मुझसे अखियां चुरा रहे हो तो मेरी इतनी अरज भी सुन लो,पिया मेरी ये अरज भी सुन लो।

तुम्हारे कदमों में आ गयी हूं,यहीं जिऊंगी,यहीं मरूंगी।
छोटी बहू का क़िरदार विवश नहीं है। वह विलाप में समय नहीं गंवाती। बल्कि परिस्थिति से संघर्ष कर अपना अधिकार हासिल करना चाहती है। उसे चौधरी खानदान की अन्य ब्याहताओं की तरह अन्य सारे आमोद प्रमोद या स्वर्ण आभूषण स्वीकार्य नहीं हैं। वह सोने के पिंजरे में कैद मैना नहीं बनना चाहती। पत्नी से सहवास को नामर्दी कहकर उपहास उड़ाने वाले तथा वेश्याओं के साथ रंगरेलियों को ही पुरुषार्थ समझने वाले पति को वह प्रणय का खुला आमंत्रण तक दे देती है। जब पति शराब पीकर,नाच गाना करके रिझाने को कहता है तो यह कुलीन संस्कारी स्त्री उस आव्हान को भी स्वीकार कर लेती है। पति से अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति की मांग करने वाली,संतान की इच्छा जाहिर करने वाली,पति के पुरुषार्थ पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली छोटी बहू को उस दौर की क्रांतिकारी स्त्री का दर्जा दिया जा सकता है।
चित्रपट की समाप्ति से पूर्व का वह दृश्य स्मृति पटल में कैद होकर रह जाता है। पति के ईलाज के लिए बग्गी में सिद्ध पुरुष के पास जा रही छोटी बहू अपने हमदर्द और विश्वासपात्र भूतनाथ से कहती है -” मुझे आज तक सिर्फ़ तू ही समझ सका रे। भगवान करे मेरी उमर भी उनको (पति) लग जाये। सुन,अगर मैं मर गई तो मुझे खूब सजाना। और मेरी मांग सिंदूर से भर देना। ताकि लोग कहें कि सती लक्ष्मी गुज़र गई। इसी में मेरा मोक्ष है रे।” इस दृश्य में बग्गी के भीतर खिड़की की जाली की परछाई छोटी बहू के चेहरे पर पड़ती है जो उसके मन के उहापोह का प्रतीक है। वी.के.मूर्ति का छाया प्रकाश का नायाब करिश्मा हमारे मस्तिष्क में घर कर जाता है।
कोई दूर से…. गीत एक बड़े ही गूढ़ वातावरण में पर्दे पर आता है। हवेली के नियम कायदों से अभ्यस्त होता ग्रामीण भूतनाथ थककर सोया हुआ है। देर रात उसकी नींद खुलती है। बाहर कुत्ते भौंक रहे हैं। दरबान ऊंघ रहा है। हवेली में एक रहस्यमय घना सन्नाटा पसरा हुआ है। वह कमरे की मुंडेर से झांकता है। एक दर्द भरी आवाज़ सुनाई देती है। जिया बुझा बुझा,नैना थके थके…। हवेली के सामने वाले हिस्से में एक आकृति नज़र आती है। कैमरा भूतनाथ के चेहरे पर फोकस होता है। छाया और प्रकाश की लुकाछिपी के बीच भूतनाथ इस पहेलीनुमा आकृति का चेहरा देखने की कोशिश करता है। तभी एक बग्गी प्रांगण में आकर रुकती है। नौकर दौड़कर बग्गी से नशे में धुत छोटे बाबू को उतारकर भीतर ले जाकर तखत पर लिटा देता है। भूतनाथ के चेहरे पर भय युक्त उत्कंठा के भाव हैं।
यह गीत पिया ऐसो जिया में और न जाओ सैयां के बीच की कड़ी है। इस गीत को कोई गा नहीं रहा। यह छोटी बहू की व्यथा और विरह को पार्श्व में अभिव्यक्त करता है। उसका मन उदास है। पिया की प्रतीक्षा में आंखें थक चुकी हैं। वह साजन को पुकार रही है। बहुत रात हो गई। अब चले भी आओ। कोई दूर से पुकार रहा है। चले आओ।
सजनी ने प्रतीक्षा में पूरी रात बिता दी। अब तो रात के साथ दिल भी डूब चुका है। इस अबला से और इंतज़ार सहन नहीं होता। धैर्य जवाब दे चुका है। अब चले भी आओ।
इस तरह उम्मीदों पर पानी फेरकर,मुंह मोड़कर,साथ छोड़कर तुम्हें क्या मिलेगा?इस विरहणी को ऐसे न तरसाओ। चले आओ।
(दूसरा अंतरा फ़िल्म में नहीं है। संभवतः फ़िल्म की लंबाई अधिक होने से हटा दिया गया है।)
जिया बुझा बुझा
नैना थके थके
पिया धीरे धीरे
चले आओ,चले आओ
चले आओ
कोई दूर से आवाज़ दे
चले आओ
चले आओ,चले आओ
चले आओ
कोई दूर से…
रात रात भर इंतज़ार है
दिल दर्द से बेक़रार है II1II
साजन इतना तो ना
तड़पाओ
चले आओ…
आस तोड़ के मुख मोड़ के
क्या पाओगे साथ छोड़ के II2II
बिरहन को अब यूं ना
तरसाओ
चले आओ…

यह चित्रपट एक अनुत्तरित एवं विचारणीय प्रश्न छोड़ जाता है। इसकी केंद्रीय पात्र कौन थी? चौधरी खानदान की पतिप्रेम से वंचित छोटी बहू? या कमाल अमरोही से विभक्त मीना कुमारी? या गुरु दत्त से टूटी हुई गीता दत्त। ये तीनों एक ही त्रासदी का शिकार हुईं। मीना कुमारी और गीता दत्त,दोनों को शादी का प्रस्ताव दूसरे पक्ष से मिला। दोनों ने फ़िल्मकारों से विवाह किया। दोनों का दाम्पत्य जीवन दुःखभरा रहा। और दोनों ने ही खुद को शराब में डुबोकर मौत को गले लगा लिया। इन दोनों के व्यक्तिगत दुःख, वैवाहिक जीवन की दरार और एकाकीपन ने छोटी बहू की पीड़ा को चरम अभिव्यक्ति प्रदान की। गीता दत्त ने तो बिमल मित्र से यह तक कह दिया था कि इस फ़िल्म में उनकी दास्तां बयां हुई है। जब तक पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की उपेक्षा व दमन खत्म नहीं होंगे,निष्ठुर पत्थर से कुचले गये मोगरे के गजरे से आह निकलती रहेगी- कोई दूर से आवाज़ दे,चले आओ।

श्रीधर कामत प्रिया प्रभुदेसाई

9826824680 9930271422

भाग – 53 चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जायेगा

जीवन की क्षणभंगुरता भारतीय आध्यात्म का प्रिय विषय रहा है। सदियों से रचनाकारों ने दोहे,चौपाई और भजनों में इसी को आधार बनाकर गीत गंगा को प्रवाहमान रखा। विज्ञान के इस व्यस्त आधुनिक युग में इस विषय का नई पीढ़ी द्वारा स्वीकारा जाना सहज नहीं था। इस बात को जेहन में रखकर सत्तर के दशक में एक कव्वाली रची गई जो उस दौर में श्रोताओं को झकझोर गई और जिसे सुनकर आज भी रसिकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
गीत गाथा इस बार वही बरसों पुरानी कव्वाली लेकर आई है जिसपर वक्त की ज़रा भी धूल नहीं जमी। आज के दौर में तो यह और भी मौजू है। यह कव्वाली नहीं एक कटु सत्य है जो हमें आसमान से धरातल पर लेकर आता है। यह कव्वाली है -चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जायेगा। इस कव्वाली ने पारंपरिक भक्तिभाव, धार्मिकता और भाषा की दीवारें तोड़कर धर्मनिरपेक्ष भावना को अपनाया। यही वजह है कि यह रचना भारतीय जनमानस में गहरी रच बस गई। पचास साल बाद भी इसकी धार ज़रा भी कुंद नहीं हुई।
जिस दौर में राग भूपेश्वरी में निबध्द यह कव्वाली मक़बूल हुई थी,संगीत सुनना आम श्रोता के बस का नहीं था। सार्वजनिक स्थानों पर जहां भी यह गूंजती,सुनकार के कदम वहीं ठिठक जाते। कान वहीं रम जाते। और वह पूरी कव्वाली का अमृतपान कर तृप्त होकर ही आगे बढ़ता। केसर रत्नागिरवी की कलम का जादू जब अज़ीज़ नाज़ा की बुलंद आवाज़ में गूंजता तो तमाम कायनात खामोश होकर उसमें गुम हो जाती। इस कालजयी कव्वाली ने फ़िल्मी गीतों के बराबर शोहरत हासिल की।
कव्वाली सूफ़ी परंपरा के तहत भक्ति संगीत की गायन विधा है। इसका उद्गम सात सदी पूर्व फारस (ईरान) में हुआ था। यह भारतीय उपमहाद्वीप में अत्यंत लोकप्रिय गायन शैली है। आरंभ में यह खुदा की इबादत का जरिया थी। फ़िल्मों ने इसे मोहब्बत का माध्यम बना दिया। बीसवीं सदी के दौरान ही कव्वाली में दर्शन और उपदेश व्यक्त होने लगे।
जिन कव्वालों ने इस विधा को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाया उनमें प्रमुख हैं – नुसरत फतेह अली,साबरी बंधु,अज़ीज़ नाज़ा,जानी बाबू,इस्माईल आज़ाद,युसुफ आज़ाद,शंकर शंभू और शकीला बानो भोपाली। साठ के दशक में ना तो कारवां की तलाश है और ये इश्क इश्क है, इश्क इश्क की लोकप्रियता के बाद सिने संगीत में कव्वाली का उत्कर्ष हुआ। प्रायवेट कव्वालियों के रिकॉर्ड आने लगे और कैसेट क्रांति के बाद कव्वाली घर घर पहुंच गई। उस दौर की प्रसिद्ध कव्वालियां हैं -भर दे झोली मेरी या मोहम्मद,छाप तिलक सब छोड़ी,माटी के पुतले तुझे कितना गुमान है,चांद को छूने वाले इंसां,झूम बराबर झूम शराबी,दमा दम मस्त कलंदर।
फ़िल्मी गीतकारों ने भी जीवन की नश्वरता पर खूब कलम चलाई है। मिसाल के तौर पर – आये भी अकेला जाये भी अकेला,छोटी सी ये ज़िंदगानी तेरी,चल अकेला चल अकेला,ये ज़िंदगी के मेले,है बहार-ए- बाग-ए-दुनिया चंद रोज़,ज़िंदगी कैसी है पहेली,दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी, कुछ भी नहीं है तेरा मोल,जगत में कोई नहीं तेरा मेरा,मन रे तू काहे न धीर धरे आदि। इन सभी दर्शन गीतों में वैराग्य या जीवन की नश्वरता की भावना परिलक्षित होती है। चढ़ता सूरज… में इन सभी गीतों का सार समाया हुआ है।
अज़ीज़ नाज़ा महज़ नामचीन कव्वाल ही नहीं एक नेक और रहमदिल इंसान थे। उन्होंने हमेशा गरीबों और बीमारों की मदद की। कोई भिखारी दरवाज़े पर आकर कुछ गाता तो वे ध्यान लगाकर उसका गाना सुनते और बक्शीस देकर उसे बिदा करते। उन्होंने ताउम्र साथी कलाकारों की कद्र की। कव्वाली में ऑर्केस्ट्रा का प्रयोग किया और उसे लोकप्रिय बनाया। स्वरों के उतार चढ़ाव और ज़बरदस्त रेंज के कारण उन्होंने इस विधा में अलग मुकाम हासिल किया। अज़ीज़ नाज़ा ने हमेशा कोरस में कव्वालों की ही आवाज़ का इस्तेमाल किया। वे शेर के मजमून की गहराई तक जाकर श्रोताओं के सामने उसका अक्स पेश करते थे। उनकी जीवंत प्रस्तुति शैली से सुनकार उन्हें अपने दिल के करीब पाता था।
कव्वाल अज़ीज़ नाज़ा की एक मशहूर गैर फ़िल्मी कव्वाली झूम बराबर झूम शराबी को बाद में फाइव राईफल्स फ़िल्म में शामिल किया गया। नियति का चक्र कुछ ऐसा घूमा कि चढ़ता सूरज चार दशक बाद मधुर भंडारकर की फ़िल्म इंदू सरकार (2017)में गूंजी। लेकिन तब तक अज़ीज़ नाज़ा सुपुर्द-ए-खाक़ हो चुके थे। इसे उनके साहबजादे मुज़्तबा ने अन्नू मलिक के संगीत निर्देशन में पेश किया।
चढ़ता सूरज… का आगाज़ एक गहन गंभीर शेर से होता है। ऊंचे स्वरमान में पेश इस शेर से ही अज़ीज़ नाज़ा महफ़िल लूट लेते हैं। इसे सुनकर कईं सूरमाओं के चेहरे निगाह के सामने घूमने लगते हैं। चंगेज़ खान,सिकंदर,नेपोलियन, हिटलर,सद्दाम हुसैन और ईदी अमीन जैसे शक्तिशाली धुरंधरों के नश्वर शरीर खाक़ में मिल गये। ये यौवन,ये सौंदर्य और ये सत्ता क्षणिक है। इसपर अभिमान करना मूर्खता है। हे नादान मानव, इस संसार में अनेक महारथी स्मृतिशेष हो गए तो तेरी क्या बिसात? तेरी जवानी प्रखर हो रहे दोपहर के सूर्य की तरह है। इसका गर्व मत कर। याद रख,सांझ ढलते ही तेरा ये उन्मादी यौवन बुढापे में बदल जायेगा और सूर्यास्त की तरह तेरा जीवन भी अस्त हो जायेगा। ये नाम, शान-ओ-शौकत,रुतबा,दौलत,सत्ता,ताक़त ये सब यहीं छूट जायेंगे। इनका नशा मत कर वर्ना एक दिन पछतायेगा।

नींद से जाग ऐ इंसान। तू इस दुनिया (मृत्युलोक) में चार दिन का मेहमान है। यहां जो धन दौलत, इज़्ज़त और शोहरत कमायेगा,वह परलोक में साथ नहीं जाना है। यह अटल सत्य है कि तुझे इस संसार से खाली हाथ ही बिदा होना है। इस मोहमाया और अहम् के फेर में तू उस परम सत्ता को भी भूल गया है जिसकी कृपा से तूने इस दुनिया में जन्म लिया। सत्य मनुष्य को वैराग्य की ओर ले जाता है। जिसने सत्य को समझ लिया उसके लिए जीवन व्यर्थ है। जो मिला ही नहीं उसे गंवाने का कैसा रंज? माना कि इस सुंदर दुनिया को छोड़कर जाना त्रासदी है। पर यहां कोई हमेशा के लिए रुक नहीं सकता। और एक दिन तो इस पृथ्वी का भी अस्तित्व नहीं रहेगा। फिर किस मोहपाश में उलझा हुआ है? अब भी समय है, चेत जा। इस अवसर को मत गंवा और चिंताओं के मकड़जाल से मुक्त हो।
मृत्यु जीवन का अंतिम और परम सत्य है। इससे बड़े बड़े सूरमा नहीं बचे तो आम आदमी की क्या बिसात? महायोद्धाओं का जीवन भी पानी के बुलबुले की तरह रहा है। सिकंदर जैसे बाहुबली के पास शौर्य था,हिम्मत थी, दूरदृष्टि थी और विश्वविजेता बनने का पक्का इरादा भी था। पर यह धुरंधर मरते समय कुछ भी साथ नहीं ले जा सका। हलाकू और पोरस जैसे पराक्रमी भी एक दिन काल के गाल में समा गये। कल तक जो दिग्गज अपनी शान-ओ-शौकत के दम पर अकड़ते थे,आज उनकी कब्र पर कोई दीया तक नहीं लगाता। छोटा बड़ा,अमीर गरीब एक दिन सबको पंचतत्व में विलीन होना है। मानव जैसा बोता है,वैसा ही फल पाता है। याद रख,सिर उठाकर चलने वाले को एक न एक दिन ठोकर लगना तय है।
इस जहान में कोई भी अमरपट्टा लेकर नहीं आया है। मृत्यु अटल है। उससे कोई नहीं बच सकता। एक बार शरीर से प्राण निकलने पर इंसान के सारे रिश्ते नाते खत्म हो जाते हैं। जिन्हें तू जीवन भर अपना शुभचिंतक समझता रहा, वे तेरी मौत का तमाशा देखने के लिए कफ़न लेकर तैयार खड़े हैं। ये तेरे साथी नहीं,तेरी कब्र रूपी मंज़िल के बराती हैं। तेरे जनाज़े में ये तेरे सगे संबंधी चंद कदम साथ चलकर अपना रास्ता बदल लेंगे। ये सिर्फ़ मतलबी होते हैं। वक्त आने पर तेरी लाश को कब्र में रखकर उसपर मिट्टी डालकर तुझे भुला देंगे। तो फिर हे मूर्ख मानव,तू किसके भरोसे इतना इतरा रहा है। कोई भी पल जीवन का अंतिम क्षण हो सकता है। अभी भी समय है। अपने पापों का प्रायश्चित कर ले। परमेश्वर की शरण में जा। अगर तूने अपना जीवन सुधार लिया तो परमात्मा के दरबार में पाप पुण्य के हिसाब के समय तुझे कष्ट नहीं होगा। सनद रहे,सदाचार ही मनुष्य की असली दौलत है।
इस कव्वाली में मानव जीवन के सार का निरूपण है। मनुष्य को महत्वाकांक्षी होना चाहिए। पर जब क्षणिक सफलता से महत्वाकांक्षा पर अहंकार सवार हो जाता है तब इंसान दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। वह यह तक भूल जाता है कि उसका मानव योनि में जन्म,यह आयु और यह जीवन शाश्वत नहीं है। जब इसका अंत होगा तब यह यश,कीर्ति,सम्मान सब पीछे छूट जायेगा। उसे दुनिया को खाली हाथों से अलविदा कहना है। वह अपने सद्कर्मों से ही जीवित रह सकता है। यदि मानव अपना आचरण सुधार ले तो यह दुनिया स्वर्ग बन जायेगी। यही इस कव्वाली का भावार्थ है।
हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे
ये ज़मीं खा गयी नौजवां कैसे कैसे
आज जवानी पर इतराने वाले कल पछतायेगा
चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जायेगा
ढल जायेगा,ढल जायेगा
तू यहां मुसाफ़िर है ये सराय फानी है
चार रोज़ की मेहमां तेरी ज़िंदगानी है II1II
ये ज़र ज़मीन,ज़र ज़ेवर कुछ न साथ जायेगा
खाली हाथ आया है खाली हाथ जायेगा
जानकर भी अनजाना बन रहा है दीवाने
अपनी उम्र-ए-फ़ानी पे तन रहा है दीवाने
इस कदर तू खोया है इस जहां के मेले में
तू खुदा को भूला है फंस के इस झमेले में
आज तक ये देखा है पाने वाला खोता है
ज़िंदगी को जो समझा ज़िंदगी पे रोता है
मिटने वाली दुनिया का ऐतबार करता है
क्या समझ के तू आखिर इससे प्यार करता है
अपनी अपनी फिकरों में जो भी है वो उलझा है
ज़िंदगी हकीक़त में क्या है कौन समझा है
आज समझ ले
आज समझ ले कल ये मौका हाथ न तेरे आयेगा
ओ गफ़लत की नींद में सोने वाले धोखा खायेगा
चढ़ता सूरज धीरे-धीरे….
मौत ने ज़माने को ये समां दिखा डाला
कैसे कैसे रुस्तम को ख़ाक में मिला डाला II2II
याद रख सिकंदर के हौसले भी आली थे
जब गया दुनिया से दोनों हाथ खाली थे
अब न वो हलाकू है और न उसके साथी हैं
जंग जू ओ पोरस है और न उसके हाथी हैं
कल जो तन के चलते थे अपनी शान-ओ-शौकत पर
शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी तुरबत पर
अदना हो या आला हो सबको लौट जाना है
मुफ़लिस-ओ-तवंगर का कब्र ही ठिकाना है
जैसी करनी वैसी भरनी
जैसी करनी वैसी भरनी आज किया कल पायेगा
सिर को उठाकर चलने वाले इक दिन ठोकर खायेगा
चढ़ता सूरज धीरे-धीरे…
मौत सबको आती है कौन इससे छूटा है
तू फ़ना नहीं होगा ये खयाल झूठा है II3II
सांस टूटते ही सब रिश्ते टूट जायेंगे
बाप,मां,बहन,बीबी,बच्चे छूट जायेंगे
तेरे जितने हैं भाई वक्त का चलन देंगे
छीनकर तेरी दौलत दो गज़ कफ़न देंगे
जिनको अपना कहता है कब वो तेरे साथी हैं
कब्र है तेरी मंज़िल और ये बराती हैं
लाके कब्र में तुझको मुर्दा पाक डालेंगे
अपने हाथों से तेरे मुंह में ख़ाक डालेंगे
तेरे सारे उल्फत को ख़ाक में मिला देंगे
तेरे चाहने वाले कल तुझे ही भुला देंगे
इसलिए ये कहता हूं खूब सोच ले दिल में
क्यों फंसाये बैठा है जान अपनी मुश्किल में
कर गुनाहों से तौबा आके बस संभल जाए
दम का क्या भरोसा है जाने कब निकल जाए
मुट्ठी बांध के आने वाले
मुट्ठी बांध के आने वाले हाथ पसारे जायेगा
धन दौलत जागिर से तूने क्या पाया क्या पायेगा
चढ़ता सूरज धीरे-धीरे…
केसर रत्नागिरवी की यह केसर गंधित कव्वाली मनुष्य के जीवन का आईना है। इसमें इंसान को सद्कर्म करते रहने का संदेश है। यह कव्वाली हमें आत्मावलोकन की प्रेरणा देती है। इसे नैराश्य के परिप्रेक्ष्य में न लेते हुए इसकी नसीहतों पर अमल करें तो लगेगा कि यह हमें मोक्ष का मार्ग बता रही है। आजकल ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझाने वाली ऐसी कव्वालियां न रची जाती हैं, न सुनने को मिलती हैं। हम इस भौतिक युग में जीवन का परम और अंतिम सत्य समझे बिना एक मिथ्या ज़िंदगी जी रहे हैं। इतिहास से सबक न सीखते हुए आत्ममुग्ध होकर स्वप्नलोक में रमे हुए हैं। और चढ़ते सूरज की चकाचौंध में उसके अस्त होने की वास्तविकता से अंजान हैं।

श्रीधर कामत

9826824680

चुनिंदा अंश श्रीनिवास बेलसरे,पुणे 9969921283 के लेख से साभार

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